08/21/2026 | Press release | Distributed by Public on 08/21/2026 08:59
चंपत राय के वायरल पत्र में राम जन्मभूमि स्थल पर कराए गए रडार सर्वे और पुरातात्विक उत्खनन का उल्लेख है। पत्र के अनुसार विशेषज्ञों ने जमीन के नीचे 16.5 फीट तक तस्वीरें ली थीं। इसके बाद पुरातत्व सर्वेक्षण ने उत्खनन किया। पत्र में रिपोर्ट और 2010 के इलाहाबाद हाईकोर्ट के फैसले का भी जिक्र है।
Link Copied
खबरें लगातार पढ़ने के लिए अमर उजाला एप डाउनलोड करें
यह खबर एप पर पढ़ें
या
वेबसाइट पर पढ़ना जारी रखने के लिए वीडियो विज्ञापन देखें
अगर आपके पास प्रीमियम मेंबरशिप है तो
लॉगिन करेंराम मंदिर ट्रस्ट के पूर्व महासचिव चंपत राय की ओर से लिखा गया 21 पेज का एक और पत्र सोशल मीडिया में वायरल हो रहा है। इस पत्र में चंपत राय ने मंदिर के अस्तित्व के सवाल पर रडार सर्वे और पुरातात्विक उत्खनन का विस्तृत उल्लेख किया है। उन्होंने श्रीराम जन्मभूमि मंदिर इतिहास और संघर्ष...शीर्षक से एक पत्र तैयार किया है।
इस सवाल के जवाब के लिए जमीन के नीचे वैज्ञानिक जांच कराने का प्रयास किया गया। दिल्ली आईआईटी और रूड़की आईआईटी से संपर्क किया गया, लेकिन दोनों संस्थानों ने असमर्थता जताई। इसके बाद 'तोजो विकास इंटरनेशनल' नाम की संस्था के विशेषज्ञों के माध्यम से रडार सर्वे कराया गया।
पत्र के मुताबिक, वर्ष 2003 में कनाडा के विशेषज्ञों ने रडार तरंगों के माध्यम से जमीन की सतह के नीचे करीब 16.5 फीट तक 50 से अधिक स्थानों की तस्वीरें लीं। इन तस्वीरों के आधार पर तैयार रिपोर्ट में जमीन के नीचे किसी भवन की मौजूदगी का उल्लेख किया गया था। इसके बाद रडार रिपोर्ट की सत्यता और उसमें सामने आए तथ्यों की जांच के लिए एएसआई को संबंधित स्थानों पर उत्खनन करने का आदेश दिए जाने का पत्र में उल्लेख है।
चंपत राय के लिखे पत्र के अनुसार मजदूरों में 40 प्रतिशत मुस्लिम समाज से रखने, उत्खनन की फोटोग्राफी और वीडियोग्राफी कराने तथा सभी पक्षकारों, उनके अधिवक्ताओं और विशेषज्ञों को मौके पर मौजूद रहने की अनुमति दी गई थी। यह उत्खनन करीब छह महीने चला। एएसआई की रिपोर्ट दो हिस्सों में थी। एक हिस्से में तस्वीरें थीं, जबकि दूसरे में मानचित्र और लिखित विवरण शामिल था।
रिपोर्ट के सारांश का हवाला देते हुए लिखा है कि यहां एक उत्तर भारतीय शैली का मंदिर था। पत्र में बाताया गया है कि प्राचीन, मध्यकालीन और आधुनिक इतिहास से संबंधित पुस्तकों, राजस्व अभिलेखों, रडार फोटोग्राफी रिपोर्ट, उत्खनन रिपोर्ट और गवाहों के बयानों को आधार बनाकर 30 सितंबर 2010 को इलाहाबाद हाईकोर्ट के तीनों न्यायाधीशों ने अलग-अलग निर्णय सुनाए।