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08/11/2026 | Press release | Distributed by Public on 08/10/2026 22:27

Bihar: 11 अगस्त 1942 का वो दिन, सीने पर गोली मारो कहकर शहीद हुए जगतपति, आज खंडहर में तब्दील है शहीद घर

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Bihar: 11 अगस्त 1942 का वो दिन, सीने पर गोली मारो कहकर शहीद हुए जगतपति, आज खंडहर में तब्दील है शहीद घर

Tue, 11 Aug 2026 07:45 AM IST
अमर उजाला ब्यूरो न्यूज डेस्क, अमर उजाला,औरंगाबाद
न्यूज डेस्क, अमर उजाला,औरंगाबाद Published by: अमर उजाला ब्यूरो Updated Tue, 11 Aug 2026 07:45 AM IST
सार

11 अगस्त 1942 को भारत छोड़ो आंदोलन के दौरान पटना सचिवालय पर तिरंगा फहराने निकले सात छात्रों ने अंग्रेजी हुकूमत की गोलियों का सामना किया और शहीद हो गए। इन सात शहीदों में औरंगाबाद के ओबरा प्रखंड स्थित खरांटी गांव के जगतपति कुमार भी शामिल थे।

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खंडहर में तब्दील हुआ शहीद जगतपति कुमार का घर - फोटो : अमर उजाला
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विस्तार

तारीख थी 11 अगस्त 1942, जगह थी पटना सचिवालय और समय था सुबह 11 बजकर 2 मिनट। देश अंग्रेजी हुकूमत की गुलामी की जंजीरों में जकड़ा था। आजादी के मतवाले युवाओं की एक टोली हाथ में तिरंगा लिए पटना सचिवालय पहुंची थी। उनका मकसद था अंग्रेजी हुकूमत के बीच तिरंगा फहराना। लेकिन जैसे ही छात्र सचिवालय के पूर्वी गेट की ओर बढ़े, ब्रिटिश अधिकारियों के आदेश पर गोलियां चलने लगीं। देखते ही देखते सात नौजवान देश की आजादी की बलिवेदी पर शहीद हो गए। हालांकि, गोलियों से छलनी होने के बावजूद इन युवाओं ने तिरंगे को सचिवालय पर फहरा दिया।

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इन सात शहीदों में औरंगाबाद जिले के ओबरा प्रखंड के खरांटी गांव के रहने वाले जगतपति कुमार भी शामिल थे। बीएन कॉलेज के छात्रों का नेतृत्व करते हुए उन्होंने अंग्रेजी हुकूमत की गोलियों का सामना किया था। आजादी की लड़ाई में उनका योगदान इतिहास का गौरवपूर्ण अध्याय है, लेकिन विडंबना यह है कि जिस घर में उनकी किलकारियां गूंजी थीं, वह आज खंडहर में तब्दील हो चुका है।
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सात शहीदों की शहादत से जुड़ा है 11 अगस्त का इतिहास

11 अगस्त की तारीख भारतीय स्वतंत्रता संग्राम के इतिहास में बेहद महत्वपूर्ण है। वर्ष 1942 में पटना सचिवालय में तिरंगा फहराने के दौरान सात युवा शहीद हुए थे। इससे पहले 11 अगस्त 1908 को मुजफ्फरपुर जेल में क्रांतिकारी खुदीराम बोस को अंग्रेजी हुकूमत ने फांसी दी थी। पटना के पुराने सचिवालय के पास स्थित सात शहीद स्मारक आज भी उन सात युवाओं की वीरगाथा को याद दिलाता है। इन शहीदों के नाम आज भी पूरे सम्मान के साथ लिए जाते हैं।

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सात शहीदों में एक थे औरंगाबाद के जगतपति कुमार

सात शहीदों में शामिल जगतपति कुमार की जन्मभूमि औरंगाबाद जिले के ओबरा प्रखंड के पुनपुन नदी के किनारे बसे खरांटी गांव में है। उपलब्ध प्रमाणपत्र के अनुसार उनका जन्म 7 मार्च 1923 को हुआ था। वह जमींदार सुखराज बहादुर के परिवार से थे। उनके दो बड़े भाइयों केदार सिंहा और सरयू प्रसाद के बाद जगतपति कुमार तीसरे पुत्र थे। जगतपति कुमार की प्रारंभिक शिक्षा नौ वर्ष की उम्र तक गांव की पाठशाला में हुई। इसके बाद वर्ष 1932 में उच्च शिक्षा के लिए वह पटना चले गए। उन्होंने कॉलेजिएट स्कूल से वर्ष 1938 में मैट्रिक की परीक्षा पास की और इसके बाद बीएन कॉलेज में दाखिला लिया।

भारत छोड़ो आंदोलन में कूद पड़े थे जगतपति

वर्ष 1942 में देश में भारत छोड़ो आंदोलन शुरू हुआ तो जगतपति कुमार भी आंदोलन में शामिल हो गए। 9 अगस्त को डॉ. राजेंद्र प्रसाद की गिरफ्तारी के बाद पूरे बिहार में आंदोलन की चिंगारी और तेज हो गई। छात्र शक्ति भी आंदोलन में सक्रिय हो गई और अंग्रेजी शासन के खिलाफ जगह-जगह विरोध शुरू हो गया। इसी दौरान छात्रों ने अंग्रेजी शासन के खिलाफ रेल और तार व्यवस्था को बाधित करना शुरू किया। 11 अगस्त को पटना के भंवर पोखर में सभा को संबोधित करने के दौरान अनुग्रह नारायण सिंह की गिरफ्तारी के बाद छात्रों में और आक्रोश फैल गया।

अनुग्रह बाबू की गिरफ्तारी के बाद सचिवालय की ओर निकली छात्रों की टोली

अनुग्रह नारायण सिंह की गिरफ्तारी के विरोध में छात्रों की टोली सचिवालय पर तिरंगा फहराने के लिए निकल पड़ी। इसी टोली का नेतृत्व बीएन कॉलेज के छात्रों की ओर से जगतपति कुमार कर रहे थे। छात्र जैसे ही तिरंगा लेकर सचिवालय के पूर्वी गेट की ओर आगे बढ़े, अंग्रेज जिलाधिकारी डब्ल्यू. जी. आर्चर के आदेश पर उन पर गोलियां चला दी गईं। गोलियों की बौछार के बीच सात नौजवान 'वंदे मातरम्' का उद्घोष करते हुए शहीद हो गए। लेकिन उनकी शहादत के बावजूद तिरंगा सचिवालय पर फहराया गया। बताया जाता है कि गोलीबारी के दौरान जब जगतपति कुमार के पैर में गोली लगी तो उन्होंने अंग्रेज अधिकारियों को ललकारते हुए कहा था-"पैर में गोली क्या मारते हो, सीने पर मारो।"

हर साल याद किए जाते हैं सातों शहीद

हर वर्ष 11 अगस्त को पटना के सात शहीद स्मारक पर इन वीर सपूतों को श्रद्धांजलि दी जाती है। सात शहीदों में रामानंद सिंह, जगतपति कुमार, रमाकांत सिंहा, सतीश प्रसाद झा, देवीनंद चौधरी, राजेंद्र सिंह और रामगोविंद सिंह शामिल हैं। इस अवसर पर शहीदों को याद करते हुए अक्सर यह पंक्ति दोहराई जाती है, "शहीदों के मजारों पर लगेंगे हर बरस मेले, वतन पर मरने वालों का बाकी यही निशां होगा।" 11 अगस्त 2026 को भी पटना में सात शहीदों को श्रद्धांजलि दी जाएगी। वहीं, जगतपति कुमार के पैतृक गांव खरांटी में पुनपुन नदी के किनारे स्थित उनके स्मारक पर भी शहादत समारोह आयोजित कर उन्हें श्रद्धांजलि दी जाएगी।

शहीद का पैतृक आवास अब खंडहर में तब्दील

जिस घर में जगतपति कुमार का जन्म हुआ, जहां उनकी बचपन की यादें जुड़ी हैं और जहां उनकी किलकारियां गूंजी थीं, वह पैतृक आवास आज बदहाल स्थिति में है। कभी बुलंद इमारत रहा यह मकान अब खंडहर में बदल चुका है। स्थानीय स्तर पर बताया जाता है कि यह जगह अब सांप-बिच्छुओं का बसेरा बन चुकी है।

शहीद की विरासत को संरक्षित करने की मांग

आमतौर पर स्वतंत्रता सेनानियों और शहीदों से जुड़ी जगहों और वस्तुओं को संरक्षित कर उन्हें आने वाली पीढ़ियों के लिए प्रेरणा का केंद्र बनाया जाता है। लेकिन जगतपति कुमार के मामले में ऐसा प्रयास नजर नहीं आता।
खरांटी गांव में उनकी आदमकद प्रतिमा भी नहीं है। गांव स्थित स्मारक में उनकी छोटी प्रतिमा स्थापित है। औरंगाबाद जिला मुख्यालय में भी उनके नाम का कोई बड़ा स्मारक नहीं है। नगर भवन और रमेश चौक के पास उनकी छोटी प्रतिमाएं जरूर स्थापित हैं।



स्थानीय लोगों का कहना है कि जिस शहीद ने देश की आजादी के लिए अपनी जान कुर्बान कर दी, उनकी स्मृतियों को उचित सम्मान और संरक्षण मिलना चाहिए। जगतपति कुमार के पैतृक आवास को संरक्षित कर राष्ट्रीय स्मारक के रूप में विकसित किया जा सकता है। इससे न केवल शहीद की स्मृति को सम्मान मिलेगा, बल्कि आने वाली पीढ़ियों को भी स्वतंत्रता संग्राम और उनके बलिदान की कहानी से रूबरू होने का अवसर मिलेगा।
Amar Ujala Ltd published this content on August 11, 2026, and is solely responsible for the information contained herein. Distributed via Public Technologies (PUBT), unedited and unaltered, on August 11, 2026 at 04:28 UTC. If you believe the information included in the content is inaccurate or outdated and requires editing or removal, please contact us at [email protected]