Amar Ujala Ltd

08/03/2026 | Press release | Distributed by Public on 08/02/2026 19:48

अध्ययन: चुनाव में पसंदीदा पार्टी की हार पर दोस्त भी बन जाते हैं दुश्मन; शोध में सामने आई चौंकाने वाली बात

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अध्ययन: चुनाव में पसंदीदा पार्टी की हार पर दोस्त भी बन जाते हैं दुश्मन; शोध में सामने आई चौंकाने वाली बात

Mon, 03 Aug 2026 06:45 AM IST
शिवम गर्ग एजेंसी, टोरंटो।
एजेंसी, टोरंटो। Published by: शिवम गर्ग Updated Mon, 03 Aug 2026 06:45 AM IST
सार

एक नए अध्ययन में खुलासा हुआ है कि पसंदीदा राजनीतिक दल की हार के बाद मतदाताओं का सामाजिक भरोसा कम हो जाता है। कई मामलों में दोस्त और रिश्तेदार भी विरोधी जैसे लगने लगते हैं।

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सांकेतिक तस्वीर - फोटो : AI
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विस्तार

कहीं चुनाव चल रहे हों और नुक्कड़-चौराहों पर लोगों की आपसी चर्चा में राजनीतिक मुद्दों पर गर्मागर्म बहस न हो, ऐसा हो नहीं सकता। जब नतीजे आते हैं तो यही राजनीतिक आक्रामकता कई बार आपसी संबंध तक बिगाड़ देती है। एक हालिया शोध रिपोर्ट से पता चलता है कि पसंदीदा पार्टी की हार पर मतदाताओं का मन कई बार इतना खिन्न हो जाता है कि उन्हें अपने रिश्तेदार और दोस्त भी दुश्मन की तरह लगने लगते हैं।

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इलेक्टोरल स्टडीज नामक अकादमिक जर्नल में प्रकाशित यह व्यापक शोध बताता है कि सियासी प्रतिस्पर्धा केवल चुनावी मंचों या राजनीतिक दलों तक सीमित नहीं रह गई है, बल्कि इसका सीधा असर सामान्य सामाजिक ताने-बाने पर भी पड़ने लगा है। दरअसल, पसंदीदा राजनीतिक दल की हार से ध्रुवीकृत मतदाताओं के मन में समाज और आसपास के लोगों के प्रति भरोसा काफी हद तक कम हो जाता है।
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विशेषज्ञों का मानना है कि सामाजिक भरोसा किसी भी स्वस्थ, प्रगतिशील और मजबूत लोकतंत्र की बुनियादी नींव है। यह नागरिकों के आपसी जुड़ाव, पारस्परिक सहभागिता को बढ़ाने के साथ समुदायों को सामूहिक समस्याओं का समाधान खोजने के लिए प्रेरित करता है। आमतौर पर यही माना जाता रहा है कि सामाजिक भरोसे का स्तर काफी हद तक स्थिर होता है और राजनीतिक उथल-पुथल या चुनावों के अल्पकालिक परिणामों से अप्रभावित रहता है।
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राष्ट्रीय चुनाव का सबसे ज्यादा पड़ता है असर
आमतौर पर यही माना जाता देश का चुनाव परिणाम एक सूचनात्मक संकेत होता है। परिणाम मतदाताओं को यह एक मोटा अनुमान देते हैं कि देश के कितने साथी नागरिक उनके राजनीतिक विचारों से सहमत हैं। लेकिन शोध में पाया गया कि हार-जीत को लेकर आक्रामकता का असर प्रांतीय या स्थानीय चुनावों के बजाय राष्ट्रीय स्तर के चुनावों में अधिक स्पष्ट रूप से दिखाई देता है।

विरोधी से द्वेष न रखने वाले नहीं होते विचलित
मैकगिल यूनिवर्सिटी, टोरंटो यूनिवर्सिटी, ज्यूरिख यूनिवर्सिटी और टोरंटो मेट्रोपॉलिटन यूनिवर्सिटी के शोधकर्ताओं ने इस अध्ययन के जरिये यह जानने की कोशिश की कि क्या चुनाव परिणाम वास्तव में नागरिकों के सामान्य दृष्टिकोण को प्रभावित करते हैं। इसमें पाया गया कि हारने वाले समर्थकों में आम लोगों पर भरोसा जताने की संभावना जीतने वाले समर्थकों की तुलना में औसतन 3.8% कम पाई गई।

जिन मतदाताओं में विरोधी दलों के प्रति द्वेष की भावना बहुत कम थी, उनके सामाजिक भरोसे पर हार-जीत का कोई असर नहीं पड़ा। शोधकर्ताओं ने यह निष्कर्ष 2004 से 2024 के बीच कनाडा के छह राष्ट्रीय संघीय चुनावों और ग्यारह प्रांतीय चुनावों के 30,000 से अधिक उत्तरदाताओं के सर्वेक्षण डाटा का विश्लेषण करके निकाला है।
Amar Ujala Ltd published this content on August 03, 2026, and is solely responsible for the information contained herein. Distributed via Public Technologies (PUBT), unedited and unaltered, on August 03, 2026 at 01:48 UTC. If you believe the information included in the content is inaccurate or outdated and requires editing or removal, please contact us at [email protected]