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09/02/2026 | Press release | Distributed by Public on 09/01/2026 20:07

निकाय चुनाव: 66 हजार से ज्यादा नामांकन ने बढ़ाई BJP-कांग्रेस की धड़कन, अब बागियों को साधने की अग्निपरीक्षा

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निकाय चुनाव: 66 हजार से ज्यादा नामांकन ने बढ़ाई BJP-कांग्रेस की धड़कन, अब बागियों को साधने की अग्निपरीक्षा

Wed, 02 Sep 2026 05:00 AM IST
Sourabh Bhatt न्यूज डेस्क, अमर उजाला, जयपुर
न्यूज डेस्क, अमर उजाला, जयपुर Published by: Sourabh Bhatt Updated Wed, 02 Sep 2026 05:00 AM IST
सार

राजस्थान निकाय चुनाव में 66,513 नामांकन के बाद बीजेपी-कांग्रेस की चिंता बढ़ी है। अब नाम वापसी तक दोनों दल बागियों को मनाने में जुटे हैं, ताकि वोट बंटवारा रोका जा सके।

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विस्तार

राजस्थान के 309 नगर निकायों के 10,245 वार्डों में नामांकन प्रक्रिया पूरी होने के साथ ही चुनावी मुकाबले की तस्वीर काफी हद तक साफ हो गई है। प्रदेशभर में 66 हजार से ज्यादा नामांकन दाखिल होने ने बीजेपी और कांग्रेस दोनों की चिंता बढ़ा दी है। अब अगले तीन दिन दोनों दलों के लिए सबसे अहम हैं, क्योंकि इस दौरान पार्टी नेतृत्व की असली परीक्षा टिकट से नाराज दावेदारों और बागियों को मनाने की होगी। मंगलवार एक सितंबर से नामांकन वापसी की प्रक्रिया शुरू हो गई जो 3 सितंबर तक चलेगी। जानकारी के अनुसार पहले ही दिन करीब 500 से ज्यादा लोगों ने नाम वापस लिए हैं। हालांकि राज्य निर्वाचन आयोग की ओर से नामांकन वापसी के अधिकृत आंकड़े अभी तक जारी नहीं किए हैं। लेकिन बड़ी संख्या में नाम वापसी की प्रक्रिया भी शुरू हो गई है।
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नामांकन के आंकड़े बताते हैं कि इस बार निकाय चुनाव में मुकाबला केवल बीजेपी और कांग्रेस के अधिकृत प्रत्याशियों के बीच नहीं रहने वाला। बड़ी संख्या में टिकट के दावेदारों ने पार्टी का टिकट नहीं मिलने के बाद निर्दलीय उम्मीदवार के तौर पर ताल ठोक दी है। ऐसे में नाम वापसी से पहले दोनों प्रमुख दलों ने अपने संगठन और प्रभावशाली नेताओं को बागियों की मान-मनुहार में लगा दिया है।
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66,513 नामांकन... अब असली खेल नाम वापसी का

प्रदेश के 41 जिलों में कुल 66,513 नामांकन दाखिल हुए हैं। जयपुर 4,292 नामांकन के साथ सबसे आगे है। इसके बाद झुंझुनूं में 3,558 और सीकर में 2,844 नामांकन हुए हैं। इतनी बड़ी संख्या में नामांकन से साफ है कि कई वार्डों में अधिकृत प्रत्याशियों के सामने पार्टी से जुड़े या मजबूत स्थानीय दावेदार भी मैदान में हैं। हालांकि नामांकन की संख्या अंतिम उम्मीदवारों की संख्या नहीं है। अब नाम वापसी के बाद तस्वीर बदल सकती है। यही वजह है कि बीजेपी और कांग्रेस दोनों का पूरा फोकस अब 'कितने उम्मीदवार मैदान में रहेंगे' से ज्यादा 'कितने बागी बैठेंगे' पर है।

BJP ने मंत्रियों को दिया बागी मनाने का टास्क

बीजेपी ने बागियों को साधने के लिए अपने मंत्रियों को खास जिम्मेदारी सौंपी है। मंत्रियों से कहा गया है कि उनके प्रभाव वाले वार्डों में यदि पार्टी का कोई अधिकृत प्रत्याशी होने के बावजूद बागी मैदान में है तो उसे नाम वापस लेने के लिए मनाया जाए।

इसके लिए बागियों से सीधे संपर्क शुरू हो गया है। कई जगह मंत्रियों और वरिष्ठ नेताओं के फोन पहुंचने लगे हैं। पार्टी की रणनीति साफ है कि एक ही वार्ड में पार्टी के वोटों का विभाजन रोकना है। बीजेपी के लिए यह इसलिए भी अहम है क्योंकि निकाय चुनाव में जीत का अंतर अक्सर बहुत कम रहता है। ऐसे में पार्टी का अपना ही बागी अधिकृत प्रत्याशी के समीकरण को बिगाड़ सकता है।

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कांग्रेस में विधायक और संगठन मैदान में

कांग्रेस भी बागियों को मनाने में पीछे नहीं है। पार्टी ने विधायकों और संगठन के स्थानीय नेताओं को नाराज दावेदारों से संपर्क करने की जिम्मेदारी दी है। आदर्श नगर से कांग्रेस विधायक रफीक खान के मुताबिक, उनकी विधानसभा में करीब 60 ऐसे लोग हैं, जिनका कांग्रेस से पुराना जुड़ाव है लेकिन टिकट नहीं मिलने से नाराज होकर उन्होंने निर्दलीय नामांकन दाखिल कर दिया है। खान का कहना है कि वह व्यक्तिगत रूप से इन दावेदारों से मिलकर उन्हें मनाने की कोशिश कर रहे हैं।

वहीं किशनपोल विधायक अमीन कागजी का कहना है कि हर चुनाव में बागी सामने आते हैं और नाम वापसी के अंतिम दिन तक बड़ी संख्या में नामांकन वापस भी लिए जाते हैं। उनके मुताबिक करीब 50 प्रतिशत तक नामांकन वापस होने की संभावना रहती है।

कांग्रेस में टिकट चयन की प्रक्रिया पर भी सवाल

बागियों की संख्या ने कांग्रेस की टिकट चयन प्रक्रिया पर उठे सवालों को भी और हवा दी है। पार्टी ने प्रत्याशी चयन से पहले करीब एक महीने तक रायशुमारी, वन-टू-वन बातचीत, पर्यवेक्षकों की रिपोर्ट और तीन-तीन नामों के पैनल तैयार करने की प्रक्रिया अपनाई थी। प्रदेश नेतृत्व ने दावा किया था कि टिकट जमीनी फीडबैक के आधार पर दिए जाएंगे। लेकिन टिकट घोषित होने के बाद कई जगहों पर नाराजगी सामने आई और दावेदारों ने निर्दलीय नामांकन दाखिल कर दिया।

इससे कांग्रेस के सामने दोहरी चुनौती है। एक तरफ बागियों को मनाना और दूसरी तरफ टिकट वितरण से नाराज पार्टी नेताओं को यह भरोसा दिलाना कि उनकी राजनीतिक भूमिका खत्म नहीं हुई है।

डोटासरा बोले- योग्य व्यक्ति का हक प्रभावित हो तो नाराजगी स्वाभाविक

टिकट वितरण के बाद सामने आई नाराजगी पर प्रदेश कांग्रेस अध्यक्ष गोविंद सिंह डोटासरा का कहना है कि राजनीति में शत-प्रतिशत लोगों को संतुष्ट करना संभव नहीं है। यदि किसी योग्य व्यक्ति का हक प्रभावित होता है तो उसकी नाराजगी स्वाभाविक है।

डोटासरा ने कहा कि कांग्रेस का दायित्व है कि नाराज कार्यकर्ताओं को बैठाकर उनसे बातचीत की जाए और उन्हें सम्मान दिया जाए। उन्होंने टिकट वितरण में पारदर्शिता का दावा करते हुए कहा कि 309 निकायों में 11 हजार से अधिक सिंबल दिए गए, विधानसभा स्तर पर कोऑर्डिनेटर भेजे गए, जिलेवार बैठकें हुईं और ऑनलाइन आवेदन लिए गए। जमीनी फीडबैक के आधार पर प्रत्याशियों का चयन किया गया।

बागियों का खेल समझिए... निकाय चुनाव विधानसभा से अलग क्यों?

निकाय चुनाव में बगावत का असर विधानसभा चुनावों से कुछ अलग होता है। यहां स्थानीय पहचान, व्यक्तिगत संपर्क और वार्ड स्तर की पकड़ कई बार पार्टी के चुनाव चिह्न पर भारी पड़ती है।
वरिष्ठ पत्रकार मनीष गोधा के मुताबिक, निकाय चुनाव में स्थानीय फैक्टर सबसे ज्यादा प्रभावी होता है। इसलिए पार्टी का टिकट नहीं मिलने के बावजूद मजबूत स्थानीय दावेदार निर्दलीय चुनाव लड़ने का फैसला कर लेता है। उनका कहना है कि असली राजनीतिक खेल चुनाव के बाद शुरू होता है। बोर्ड बनाने के लिए बहुमत की जरूरत पड़ने पर निर्दलीय पार्षद महत्वपूर्ण हो जाते हैं। ऐसे में जो पार्टी अगले तीन दिनों में अपने वार्डों में बागियों की संख्या कम करने में सफल रहेगी, उसे चुनावी फायदा मिल सकता है।

बागी सिर्फ वोट नहीं काटेंगे, बोर्ड बनाने का गणित भी बदल सकते हैं

निकाय चुनाव में बागियों की भूमिका सिर्फ अधिकृत प्रत्याशियों के वोट काटने तक सीमित नहीं है। यदि किसी वार्ड में मजबूत बागी चुनाव जीत जाता है तो चुनाव के बाद बोर्ड बनाने के लिए बीजेपी और कांग्रेस दोनों को उन्हीं निर्दलीय पार्षदों की जरूरत पड़ सकती है। यानी आज जो दावेदार पार्टी के खिलाफ मैदान में है, वह चुनाव के बाद बोर्ड की सत्ता का 'किंगमेकर' भी बन सकता है। यही कारण है कि अगले तीन दिन सिर्फ नाम वापसी के नहीं, बल्कि स्थानीय सत्ता के भविष्य का समीकरण तय करने वाले दिन हैं।

तीन दिन में तय होगा किसकी बगावत कितनी बड़ी

नामांकन के बाद राजस्थान की निकाय राजनीति में अब मुकाबला दो स्तरों पर है। पहला मुकाबला बीजेपी और कांग्रेस के अधिकृत प्रत्याशियों के बीच होगा और दूसरा मुकाबला पार्टी के भीतर टिकट से नाराज दावेदारों को मैदान से हटाने का। जिस पार्टी का संगठन अपने बागियों को ज्यादा संख्या में नाम वापस लेने के लिए राजी कर लेगा, उसके अधिकृत प्रत्याशियों के सामने सीधा मुकाबला बनने की संभावना उतनी ही मजबूत होगी। वहीं जिस पार्टी के ज्यादा बागी मैदान में रह गए, वहां वोटों के बिखराव का खतरा बढ़ेगा।

Amar Ujala Ltd published this content on September 02, 2026, and is solely responsible for the information contained herein. Distributed via Public Technologies (PUBT), unedited and unaltered, on September 02, 2026 at 02:07 UTC. If you believe the information included in the content is inaccurate or outdated and requires editing or removal, please contact us at [email protected]