08/28/2026 | Press release | Distributed by Public on 08/28/2026 16:00
2030 तक मलेरिया उन्मूलन के सतत विकास लक्ष्य (एसडीजी) को प्राप्त करने के प्रति भारत की प्रतिबद्धता पर बल देते हुए, स्वास्थ्य एवं परिवार कल्याण मंत्रालय की अपर सचिव एवं राष्ट्रीय स्वास्थ्य मिशन (एनएचएम) की मिशन निदेशक, श्रीमती आराधना पटनायक ने मंत्रालय के वरिष्ठ अधिकारियों, राष्ट्रीय वैक्टर जनित रोग नियंत्रण केंद्र (एनसीवीबीडीसी), राष्ट्रीय स्वास्थ्य मिशनों के मिशन निदेशकों तथा संबंधित राज्यों एवं जिलों के जिलाधिकारियों के साथ एक उच्च स्तरीय समीक्षा बैठक की अध्यक्षता की।
निरंतर और केंद्रित जन स्वास्थ्य प्रयासों के माध्यम से भारत ने मलेरिया के प्रभाव को कम करने में महत्वपूर्ण प्रगति की है। 2015 और 2025 के बीच, देश में मलेरिया के मामलों और इससे होने वाली मौतों में लगभग 80 प्रतिशत की कमी आई है, जबकि अत्यधिक प्रभावित जिलों की संख्या 155 से घटकर 33 रह गई है। 2022-2025 के दौरान 160 जिलों ने शून्य स्थानीय मलेरिया मामलों की रिपोर्ट दी, जो स्थानीय स्तर पर बीमारी की निरंतर रोकथाम और केंद्रित मलेरिया नियंत्रण व उन्मूलन प्रयासों की सफलता को दर्शाता है।
समीक्षा बैठक में नौ राज्यों और केंद्र शासित प्रदेशों के 33 अत्यधिक प्रभावित जिलों पर ध्यान केंद्रित किया गया, जिनमें 2025 में दर्ज कुल मलेरिया मामलों के 64 प्रतिशत और मौतों के 54 प्रतिशत मामले शामिल थे। इस दौरान मिजोरम, ओडिशा, त्रिपुरा, असम, आंध्र प्रदेश, अंडमान और निकोबार द्वीप समूह, छत्तीसगढ़, झारखंड तथा महाराष्ट्र के लिए विस्तृत राज्यवार समीक्षा की गई।
श्रीमती आराधना पटनायक ने मलेरिया के प्रभावी रोकथाम और उन्मूलन के लिए उच्च स्तर की सतर्कता बनाए रखने और केंद्रित, क्षेत्र-विशेष रणनीतियों को अपनाने की आवश्यकता पर बल दिया। उन्होंने स्थानीय महामारी विज्ञान और भौगोलिक परिस्थितियों के आधार पर लक्षित प्रयासों को सुनिश्चित करने के लिए सभी 33 अत्यधिक प्रभावित जिलों में जिला कार्य योजनाओं और अत्यधिक प्रभावित गांवों में ग्राम कार्य योजनाओं के प्रभावी कार्यान्वयन के महत्व पर जोर दिया।
शुरुआती पहचान और संपूर्ण इलाज के महत्व पर प्रकाश डालते हुए, बैठक में 'जांच, उपचार और निगरानी' की रणनीति को मजबूत करने की आवश्यकता पर बल दिया गया। निदान और उपचार में देरी को मलेरिया से होने वाली मौतों के मुख्य कारणों के रूप में पहचाना गया। राज्यों को सक्रिय निगरानी मजबूत करने तथा विशेष रूप से दुर्गम और संवेदनशील इलाकों में नैदानिक किट और मलेरिया-रोधी दवाओं की निर्बाध उपलब्धता सुनिश्चित करने की सलाह दी गई।
समीक्षा बैठक में निगरानी प्रणालियों को और मजबूत करने तथा डेटा की गुणवत्ता में सुधार लाने की आवश्यकता पर भी बल दिया गया। राज्यों को संदिग्ध रूप से अधिक वार्षिक रक्त परीक्षण दर (एबीईआर) की समीक्षा करने की सलाह दी गई, ताकि डुप्लिकेट जांच, बार-बार की गई एंट्री और बिना लक्षण वाले मामलों की जांच को शामिल किए जाने की पहचान की जा सके। यह स्पष्ट किया गया कि व्यापक जांच के माध्यम से पाए गए बिना लक्षण वाले मामलों को अलग से दर्ज किया जाना चाहिए और उन्हें एपीआई तथा एबीईआर की गणना से बाहर रखा जाना चाहिए, ताकि मलेरिया की स्थिति और कार्यक्रम के प्रदर्शन का सटीक मूल्यांकन सुनिश्चित किया जा सके।
श्रीमती आराधना पटनायक ने मलेरिया को खत्म करने के लिए अलग-अलग सेक्टरों के बीच तालमेल के महत्व पर भी जोर दिया। उन्होंने कहा कि स्वास्थ्य क्षेत्र के प्रयास अकेले मलेरिया को फैलने से नहीं रोक सकते; इसके लिए जलभराव को रोकने, मच्छरों के स्रोतों को खत्म करने और पर्यावरण प्रबंधन पर भी काम करना होगा। इसलिए राज्यों को पर्यावरणीय और वेक्टर-नियंत्रण (मच्छर-नियंत्रण) उपायों के प्रभावी कार्यान्वयन के लिए ग्रामीण विकास और शहरी विकास विभागों के साथ-साथ पंचायती राज संस्थाओं के साथ समन्वय मजबूत करने की सलाह दी गई।
बुखार के मामलों की त्वरित सूचना देने, जलभराव एवं अन्य मच्छर पनपने वाली जगहों की पहचान करने और मच्छर पनपने वाले स्रोतों को खत्म करने जैसी गतिविधियों में जन-भागीदारी को मजबूत करने के लिए स्वयं सहायता समूहों (एसएचजी), सामुदायिक स्वयंसेवकों और पंचायती राज प्रतिनिधियों की अधिक भागीदारी को भी प्रोत्साहित किया गया।
इस बैठक में स्वास्थ्य एवं परिवार कल्याण मंत्रालय के संयुक्त सचिव श्री प्रभाकर, स्वास्थ्य एवं परिवार कल्याण मंत्रालय के संयुक्त सचिव (वीबीडी) श्री निखिल गजराज, एनसीवीबीडीसी की निदेशक डॉ. तनु जैन, राष्ट्रीय स्वास्थ्य मिशन (एनएचएम) के मिशन निदेशक, संबंधित राज्यों के राज्य कार्यक्रम अधिकारी, जिलाधिकारी, मुख्य चिकित्सा अधिकारी और संबंधित जिलों के जिला मलेरिया अधिकारी शामिल हुए।