09/24/2026 | Press release | Distributed by Public on 09/24/2026 00:47
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चुनाव आयोग के भीतर मुख्य चुनाव आयुक्त यानी सीईसी और दूसरे चुनाव आयुक्तों के बीच मतभेद की कहानी नई नहीं है। आयोग के बहुसदस्यीय बनने के बाद से ही अधिकार और कामकाज को लेकर कई बार टकराव सामने आया। इस पूरी कहानी में टीएन शेषन का दौर सबसे ज्यादा चर्चित रहा, जब उन्होंने एमएस गिल और जीवीजी कृष्णमूर्ति को लेकर इतनी तीखी नाराजगी जताई। उन्होंने उन दोनों को अपने कार्यालय के दो गधे तक कह दिया था।
शेषन के कार्यकाल में सीईसी और दूसरे चुनाव आयुक्तों के बीच विवाद खुलकर सामने आया। दिए गए विवरण के अनुसार, शेषन ने एमएस गिल और जीवीजी कृष्णमूर्ति के साथ आयोग के आधिकारिक दस्तावेज साझा नहीं किए। उन्हें महत्वपूर्ण बैठकों में शामिल नहीं किया गया और आयोग से जुड़ा काम भी नहीं दिया गया। मीडिया से बातचीत में भी शेषन ने दोनों पर तीखी टिप्पणियां कीं। उन्होंने दोनों चुनाव आयुक्तों को अपने कार्यालय के दो गधे कहा।
यह बयान उस समय आयोग के भीतर चल रही खींचतान की गंभीरता को दिखाता है। विवाद केवल व्यक्तिगत मतभेद तक सीमित नहीं था। इसके केंद्र में यह सवाल भी था कि बहुसदस्यीय आयोग में मुख्य चुनाव आयुक्त के अधिकार क्या होंगे और दूसरे चुनाव आयुक्तों की भूमिका कितनी होगी। शेषन ने सरकार के साथ अपने विवाद के बारे में भी विस्तार से बताया था। उनके अनुसार, चुनावी काम के लिए कर्मचारियों की जरूरत और उन पर अनुशासनात्मक नियंत्रण के अधिकार को लेकर सरकार से लंबे समय तक मतभेद रहा। उन्होंने कर्मचारियों को दंड देने की अपनी शक्ति पर सवाल उठाए जाने का भी जिक्र किया था।
टीएन शेषन ने सरकार की ओर से चुनाव आयोग को बहुसदस्यीय बनाने के फैसले को सुप्रीम कोर्ट में चुनौती दी थी। 1995 में अदालत ने सीईसी और दूसरे चुनाव आयुक्तों की स्थिति, अधिकार और निर्णय लेने की भूमिका को लेकर महत्वपूर्ण व्यवस्था दी। इसके अनुसार मुख्य चुनाव आयुक्त और दूसरे चुनाव आयुक्तों को दर्जे, शक्तियों और निर्णय लेने के अधिकार के मामले में बराबर माना गया। सीईसी को समानों में प्रथम यानी फर्स्ट अमंग इक्वल्स कहा गया।
इसका मतलब यह था कि बहुसदस्यीय आयोग में मुख्य चुनाव आयुक्त को दूसरे आयुक्तों से ऊपर अलग तरह की निर्णायक शक्ति वाला सदस्य नहीं माना गया। आयोग के फैसलों में दूसरे चुनाव आयुक्तों की भूमिका भी महत्वपूर्ण है। शेषन के दौर का विवाद इसलिए भी अहम रहा, क्योंकि इसी दौर में यह सवाल बहुत मजबूती से सामने आया कि चुनाव आयोग के भीतर अधिकारों का बंटवारा किस तरह होना चाहिए। इस विवाद ने आगे के वर्षों में आयोग के कामकाज और उसके सदस्यों के बीच मतभेदों को समझने का आधार भी तैयार किया।
चुनाव आयोग के भीतर अगला बड़ा विवाद तत्कालीन मुख्य चुनाव आयुक्त एन गोपालस्वामी और चुनाव आयुक्त नवीन चावला के बीच सामने आया। यह विवाद 2006 से 2009 के बीच चला। अपने कार्यकाल के खत्म होने से कुछ महीने पहले गोपालस्वामी ने राष्ट्रपति को पत्र लिखकर चावला को हटाने की सिफारिश की। उन्होंने चावला पर कांग्रेस के प्रति पक्षपात का आरोप लगाया।
गोपालस्वामी ने आरोप लगाया कि चावला आयोग की बैठकों से जुड़ी जानकारी कांग्रेस के वरिष्ठ नेताओं तक पहुंचाते थे। उनके आरोप के अनुसार, वह आयोग की बैठकों के दौरान कई बार 'टॉयलेट ब्रेक' लेकर यह जानकारी देते थे। हालांकि तत्कालीन मनमोहन सिंह सरकार ने गोपालस्वामी की सिफारिश को स्वीकार नहीं किया। इसके बाद नवीन चावला ने गोपालस्वामी के बाद मुख्य चुनाव आयुक्त का पद संभाला। इस पूरे विवाद ने भी आयोग के सदस्यों के बीच मतभेद, राजनीतिक पक्षपात के आरोप और संस्था की निष्पक्षता को लेकर बहस को सामने ला दिया।
मौजूदा चुनाव आयोग को लेकर भी अंदरूनी मतभेदों की चर्चा सामने आई है। दिए गए इनपुट के अनुसार, चुनाव आयुक्त सुखबीर सिंह संधू और विवेक जोशी ने पिछले 10 महीनों के दौरान कम से कम 14 मौकों पर कुछ फैसलों और आदेशों को लेकर औपचारिक आपत्ति दर्ज कराई। उनका दावा था कि कुछ फैसले और आदेश उनकी जानकारी के बिना जारी किए गए। इन आपत्तियों में वैधानिक मतदाता पंजीकरण फॉर्म-6 में बदलाव और मतदाता सूची के डेटाबेस के केंद्रीकृत नियंत्रण जैसे मुद्दे शामिल बताए गए हैं।
चुनाव आयोग ने कहा है कि विचारों में अंतर किसी भी विचार-विमर्श का सामान्य हिस्सा है और अंतिम फैसले, जिसमें विशेष गहन पुनरीक्षण यानी एसआईआर से जुड़े फैसले भी शामिल हैं, सर्वसम्मति से लिए गए हैं। संधू और जोशी ने अपने नाम से जुड़ी इन आपत्तियों पर सार्वजनिक रूप से कोई टिप्पणी नहीं की है। वहीं विपक्षी दलों ने एसआईआर के दौरान पात्र मतदाताओं के नाम मतदाता सूची से हटाने और सत्तारूढ़ भाजपा के पक्ष में काम करने के आरोप लगाए हैं। हालांकि चुनाव आयोग ने इन आरोपों को खारिज कर दिया।