Ministry of Heavy Industries of the Republic of India

05/01/2026 | Press release | Distributed by Public on 05/01/2026 09:42

ग्रेट निकोबार परियोजना: अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न (सवाल-जवाब)

PIB Headquarters

ग्रेट निकोबार परियोजना: अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न (सवाल-जवाब)

प्रविष्टि तिथि: 01 MAY 2026 5:44PM by PIB Delhi

ग्रेट निकोबार परियोजना अंडमान सागर में भारत की मौजूदगी को मजबूत करने की एक रणनीतिक पहल है। इसका उद्देश्य बंदरगाह-आधारित विकास को संतुलित पर्यावरणीय सुरक्षा उपायों के साथ आगे बढ़ाना है। स्वदेशी समुदायों की सुरक्षा इसकी योजना का केंद्र है। यह परियोजना रणनीतिक, आर्थिक और पारिस्थितिक प्राथमिकताओं को जोड़ती है, ताकि टिकाऊ, समावेशी और राष्ट्रीय हितों के अनुरूप विकास हो।

नीचे दिए गए सवाल-जवाब परियोजना के प्रमुख पहलुओं की समझ प्रदान करते हैं:

1. क्या ग्रेट निकोबार द्वीप परियोजना एक स्पष्ट रणनीतिक और राष्ट्रीय उद्देश्य की पूर्ति करती है?

ग्रेट निकोबार द्वीप परियोजना रणनीतिक, रक्षा और राष्ट्रीय महत्व की परियोजना है, जिसे गहन जांच और विचार-विमर्श के बाद शुरू किया गया है। यह परियोजना राष्ट्रीय सुरक्षा और रणनीतिक दृष्टि से बेहद अहम है। परियोजना अंडमान सागर और दक्षिण-पूर्व एशिया में भारत की मौजूदगी को मजबूत करेगी, समुद्री और रक्षा क्षमताओं को विकसित करेगी तथा द्वीप को वैश्विक व्यापार और लॉजिस्टिक्स नेटवर्क के साथ जोड़ेगी। यह एक प्रमुख अंतरराष्ट्रीय ट्रांसशिपमेंट टर्मिनल भी स्थापित करेगी, जिसे बंगाल की खाड़ी क्षेत्र के प्रतिस्पर्धी बंदरगाहों की तुलना में विशिष्ट लाभ प्राप्त होगा, जो भारत को एक प्रमुख आर्थिक और रणनीतिक केंद्र के रूप में स्थापित करेगा।

2. क्या परियोजना में विकास उद्देश्यों के साथ-साथ मजबूत पर्यावरणीय सुरक्षा उपाय शामिल हैं?

परियोजना के संभावित पर्यावरणीय प्रभावों की व्यापक रूप से पहचान कर मूल्यांकन किया गया है और एक मजबूत 'पर्यावरण प्रभाव मूल्यांकन' (ईआईए) प्रक्रिया और एक विस्तृत 'पर्यावरण प्रबंधन योजना' (ईएमपी) के माध्यम से उन्हें प्रभावी ढंग से प्रबंधित किया जा रहा है।

यह मूल्यांकन ईआईए अधिसूचना, 2006 और आईसीआरजेड अधिसूचना, 2019 के अनुसार किया गया है। माननीय एनजीटी के 3 अप्रैल, 2023 के आदेश, जिसमें एनजीटी ने यह माना है कि "इस परियोजना का महत्व न केवल द्वीप और उसके आस-पास के रणनीतिक महत्व वाले क्षेत्रों के आर्थिक विकास से है बल्कि यह रक्षा और राष्ट्रीय सुरक्षा के लिए भी बहुत मायने रखता है। यहां तक कि अपीलकर्ताओं ने भी इन पहलुओं पर कोई आपत्ति नहीं जताई है। हालाँकि ट्रिब्यूनल का विचार-विमर्श केवल रिकॉर्ड पर मौजूद सामग्री तक ही सीमित है, फिर भी हमने (बिना किसी टिप्पणी के) मीडिया रिपोर्टों पर भी गौर किया है, जिनमें यह बताया गया है कि यह क्षेत्र चीन की 'स्ट्रिंग ऑफ़ पर्ल्स' रणनीति के अंतर्गत आता है, जिसका मुकाबला भारतीय अधिकारी भारत की 'एक्ट ईस्ट' नीति के तहत करने का प्रयास कर रहे हैं। इसमें भारतीय प्राणी सर्वेक्षण (जेडएसआई), भारतीय वन्यजीव संस्थान (डब्ल्यूआईआई), और सलीम अली पक्षी विज्ञान और प्राकृतिक इतिहास केंद्र (एसएसीओएन) जैसे प्रतिष्ठित राष्ट्रीय संस्थानों के साथ-साथ आईआईटी, एनआईओटी, एनसीसीआर और एनआईओ जैसे प्रमुख तकनीकी निकाय शामिल रहे। इस दौरान वैज्ञानिक रूप से कठोर और बहु-विषयक मूल्यांकन सुनिश्चित किया गया। हिंद महासागर, भारत और चीन के रणनीतिक हितों के एक प्रमुख मिलन-बिंदु के रूप में उभरा है। इसके अलावा म्यांमार के शिकारियों द्वारा अंडमान के पर्यावरणीय समुद्री संसाधनों के बड़े पैमाने पर शिकार किया जा रहा है जिसके लिए कई लोगों को गिरफ्तार किया गया है। अवैध शिकार की इन गतिविधियों में मूँगों को नष्ट करना, शार्क मछलियों को मारना और कीमती मछलियों को पकड़कर ले जाना शामिल है। यह परियोजना द्वीप में बुनियादी ढाँचे की कमी को दूर करने में मदद करेगी और अंतर्राष्ट्रीय व्यापार को बढ़ावा देगी, जिससे ट्रांसशिपमेंट कार्गो (माल के हस्तांतरण) पर होने वाली भारी राशि की बचत होगी।

ग्रेट निकोबार में मजबूत और स्थायी रक्षा उपस्थिति की उपलब्धता भारत को समुद्री मार्गों की प्रभावी निगरानी और सुरक्षा सुनिश्चित करने में सक्षम बनाती है तथा हिंद महासागर में विदेशी शक्तियों की बढ़ती मौजूदगी का मुकाबला करने में मदद करती है।

उपरोक्त विवरण से पता चलता है कि, ग्रेट निकोबार परियोजना अत्यंत महत्वपूर्ण राष्ट्रीय महत्व की है। यह आर्थिक विकास, अवसंरचना निर्माण और रोजगार सृजन के उद्देश्यों को महत्वपूर्ण राष्ट्रीय सुरक्षा आवश्यकताओं के साथ जोड़ती है। इससे हिंद महासागर क्षेत्र में भारत के दीर्घकालिक रणनीतिक और विकासात्मक हितों को मजबूती मिलती है।

3. क्या इस परियोजना में द्वीप के वनों और वृक्षों के आवरण को पर्याप्त रूप से संरक्षित और क्षतिपूर्ति दी जाएगी?

इस परियोजना के संभावित पर्यावरणीय प्रभावों की पूरी तरह से पहचान की गई है। एक मज़बूत 'पर्यावरणीय प्रभाव आकलन' (ईआईए) प्रक्रिया तथा एक विस्तृत 'पर्यावरण प्रबंधन योजना' (ईएमपी) के ज़रिए उनका प्रभावी ढंग से प्रबंधन किया जा रहा है। यह मूल्यांकन ईआईए अधिसूचना, 2006 और आईसीआरजेड अधिसूचना,2019 के अनुसार किया गया था। इसमें भारतीय प्राणी सर्वेक्षण (जेडएसआई), भारतीय वन्यजीव संस्थान (डब्ल्यूआईआई), और सलीम अली पक्षी विज्ञान एवं प्राकृतिक इतिहास केंद्र (एसएसीओएन) जैसे प्रतिष्ठित राष्ट्रीय संस्थानों के साथ-साथ आईटीटी, एनआईओटी, एनसीसीआर और एनआईओ जैसे प्रमुख तकनीकी निकाय शामिल थे। इसने वैज्ञानिक रूप से सख्त और बहु-विषयक मूल्यांकन सुनिश्चित किया।

उनके निष्कर्षों के आधार पर, पर्यावरणीय मंजूरी में कड़े शमन और संरक्षण उपायों को शामिल किया गया है। इनमें जैव विविधता संरक्षण योजनाएं, कोरल संरक्षण और स्थानांतरण, वन्यजीव प्रबंधन रणनीतियां तथा दीर्घकालिक पारिस्थितिक निगरानी शामिल हैं। पर्यावरण प्रबंधन योजना (ईएमपी) को पर्याप्त वित्तीय आवंटन और संस्थागत निगरानी का समर्थन प्राप्त है। यह निर्माण और संचालन दोनों चरणों के दौरान शमन उपायों के निरंतर क्रियान्वयन का प्रावधान करती है, जिससे पारिस्थितिक प्रभावों को न्यूनतम, निगरानी में और प्रभावी ढंग से जवाबदेह तरीके से प्रबंधित किया जा सके।

क्या द्वीप के जंगलों और पेड़ों के आवरण को पर्याप्त रूप से संरक्षित और क्षतिपूर्ति दी जाएगी?

विकास के लिए केवल 166.1 वर्ग किमी क्षेत्र प्रस्तावित है, जो अंडमान और निकोबार द्वीप समूह के कुल क्षेत्रफल का लगभग 2% है। इसके अतिरिक्त, परियोजना के लिए 130.75 वर्ग किमी वन क्षेत्र को डायवर्ट करने का प्रस्ताव है, जो कुल वन क्षेत्र का लगभग 1.82% है।

डायवर्ट की जाने वाली 130.75 वर्ग किमी वन भूमि में पेड़ों की कुल अनुमानित संख्या 18.65 लाख है। इनमें से, 49.86 वर्ग किमी वन क्षेत्र में अधिकतम 7.11 लाख पेड़ों को काटे जाने का अनुमान है। पेड़ों की कटाई चरणबद्ध तरीके से की जाएगी: चरण I (2025-2035) में 2.79 लाख पेड़, चरण II (2036-2041) में 3.41 लाख पेड़ और चरण III (2042-2047) में 0.91 लाख पेड़ काटे जाएंगे। इसके अलावा, ईसी (ईसी) और एफसी (एफसी) की शर्त के अनुसार, 65.99 वर्ग किमी क्षेत्र को बिना किसी पेड़ की कटाई के हरित क्षेत्र के रूप में रखा जाएगा।

वन (संरक्षण) अधिनियम, 1980 के तहत 22.05.2019 के पर्यावरण, वन और जलवायु परिवर्तन मंत्रालय के दिशा-निर्देशों के अनुसार, 75% से अधिक वन आवरण वाले राज्यों/केंद्र शासित प्रदेशों को प्रतिपूरक वनीकरण (सीए) के लिए गैर-वन भूमि प्रदान करने से छूट दी गई है और ऐसा प्रतिपूरक वनीकरण इसके बजाय उपलब्ध लैंड बैंक वाले अन्य राज्यों/केंद्र शासित प्रदेशों में किया जा सकता है।

चूंकि अंडमान और निकोबार द्वीप समूह में 75% से अधिक वन आवरण है, इसलिए प्रतिपूरक वनीकरण (सीए) केंद्र शासित प्रदेश के बाहर प्रस्तावित है। 130.75 वर्ग किमी वन भूमि के डायवर्जन की भरपाई एक व्यापक क्षतिपूरक वनीकरण योजना के माध्यम से की गई है। कुल 24,750.93 हेक्टेयर भूमि वनीकरण के लिए चिन्हित की गई है, जिसमें 1,414.95 हेक्टेयर गैर-वन भूमि (डायवर्ट किए गए क्षेत्र के बराबर) और उससे दोगुना से अधिक क्षेत्र क्षतिग्रस्त वन भूमि शामिल है। इसमें लगभग 17,000 हेक्टेयर हरियाणा में और 6,320.10 हेक्टेयर मध्य प्रदेश में है, जिससे पर्याप्त पारिस्थितिक प्रतिपूरण सुनिश्चित होता है।

हरियाणा में प्रतिपूरक वनीकरण के के लिए जिस जमीन का चिह्नीकरण किया गया है उसका एक महत्वपूर्ण हिस्सा नष्ट हो चुके वन क्षेत्रों से बना है, जिसमें पीएलपीए भूमि भी शामिल है, जो काफी हद तक अरावली क्षेत्र के भीतर स्थित हैं। इन क्षेत्रों को प्रचलित दिशा-निर्देशों के अनुसार पारिस्थितिक बहाली के लिए निर्धारित किया गया है।

क्या जनजातीय समुदायों की सुरक्षा सुनिश्चित की जाएगी, ताकि उनकी संस्कृति और अधिकारों की निरंतरता बनी रहे?

ग्रेट निकोबार द्वीप परियोजना में जनजातीय समुदायों के संरक्षण के लिए सभी वैधानिक प्रक्रियाओं और नीतिगत सुरक्षा उपायों का विधिवत पालन किया गया है। आवश्यक परामर्श सक्षम प्राधिकरणों और क्षेत्र विशेषज्ञों, जैसे कि भारतीय मानवविज्ञान सर्वेक्षण, जनजातीय कार्य मंत्रालय तथा अन्य हितधारकों के साथ, जारवा नीति 2004 और शॉम्पेन नीति 2015 के अनुरूप किया गया है। वरिष्ठ अधिकारियों और प्रतिष्ठित मानवविज्ञानियों से गठित सशक्त समिति ने स्पष्ट रूप से सुनिश्चित किया है कि विशेष रूप से संवेदनशील जनजातीय समूहों (पीवीटीजीएस), खासकर शॉम्पेन समुदाय के हितों पर कोई प्रतिकूल प्रभाव नहीं पड़ेगा। जनजातीय आबादी के किसी भी विस्थापन की अनुमति नहीं दी जाएगी। परियोजना को वन अधिकार अधिनियम, 2006 का पालन करते हुए जनजातीय कार्य मंत्रालय से अनापत्ति प्रमाणपत्र (एनओसी) भी प्राप्त कर लिया है।

वर्तमान में, ग्रेट निकोबार द्वीप में 751.070 वर्ग किमी भूमि को आधिकारिक रूप से जनजातीय आरक्षित क्षेत्र घोषित किया गया है। प्रस्तावित 166.10 वर्ग किमी विकास क्षेत्र में से 84.10 वर्ग किमी जनजातीय आरक्षित क्षेत्र के साथ ओवरलैप करता है। इस हिस्से में से 11.032 वर्ग किमी भूमि 1972 से राजस्व भूमि के रूप में पहले से ही उपयोग में है। शेष 73.07 वर्ग किमी क्षेत्र को परियोजना उद्देश्यों के लिए अधिसूचना से मुक्त किया जा रहा है। इसके प्रतिपूरण के लिए 76.98 वर्ग किमी क्षेत्र को पुनः जनजातीय आरक्षित क्षेत्र घोषित किया जा रहा है, जिससे कुल मिलाकर 3.912 वर्ग किमी की शुद्ध वृद्धि होती है। चरण-I में केवल 40.01 वर्ग किमी जनजातीय क्षेत्र शामिल है, जिसमें से 11.032 वर्ग किमी 1972 से राजस्व उपयोग में है।

क्या यह परियोजना प्राकृतिक विरासत की रक्षा और राष्ट्रीय विकास को आगे बढ़ाने के बीच एक संतुलित दृष्टिकोण अपनाती है?

इस परियोजना का व्यापक वैज्ञानिक और नियामक मूल्यांकन किया गया है, जिसमें द्वीप की जैव विविधता की विशिष्टता को ध्यान में रखा गया है। परियोजना के पर्यावरणीय प्रभावों का विस्तृत और बहु-स्तरीय आकलन पर्यावरण प्रभाव आकलन अधिसूचना, 2006 और तटीय विनियमन क्षेत्र अधिसूचना, 2019 के अनुरूप किया गया है, जिसमें द्वीप की पारिस्थितिक संवेदनशीलता और जैव विविधता के महत्व को उचित महत्व दिया गया है। इस मूल्यांकन के आधार पर, किसी भी संभावित प्रभाव से बचने, उसे कम करने और नियंत्रित करने के लिए सख्त और प्रवर्तनीय शर्तों के साथ एक मजबूत 'पर्यावरण प्रबंधन योजना' निर्धारित की गई है।

परियोजना को एक संतुलित दृष्टिकोण के साथ तैयार किया गया है, जिसमें पर्यावरणीय सुरक्षा उपायों को रणनीतिक और राष्ट्रीय विकास के उद्देश्यों के साथ जोड़ा गया है। जैव विविधता और पारिस्थितिक संतुलन की दीर्घकालिक सुरक्षा सुनिश्चित करने के लिए व्यापक शमन उपाय, निरंतर निगरानी तंत्र और संस्थागत पर्यवेक्षण की व्यवस्था की गई है। इस प्रकार, यह परियोजना एक सुविचारित पहल है, जिसमें पर्यावरणीय चिंताओं का समाधान करते हुए राष्ट्रीय हितों को आगे बढ़ाने के लिए आवश्यक सुरक्षा उपाय शामिल हैं।

क्या यह परियोजना सुव्यवस्थित रूप से नियोजित, व्यवहार्य और दीर्घकालिक प्रभाव को ध्यान में रखकर तैयार की गई है?

परियोजना के पर्यावरणीय प्रभावों का विस्तृत और बहु-स्तरीय आकलन पर्यावरण प्रभाव आकलन अधिसूचना, 2006 और तटीय विनियमन क्षेत्र अधिसूचना, 2019 के अनुरूप किया गया है। इसमें द्वीप की पारिस्थितिक संवेदनशीलता और जैव विविधता के महत्व को उचित महत्व दिया गया है। इस आकलन के आधार पर संभावित प्रभावों से बचने, उन्हें कम करने और नियंत्रित करने के लिए एक मजबूत पर्यावरण प्रबंधन योजना (ईएमपी) तथा सख्त और लागू करने योग्य शर्तें निर्धारित की गई हैं।

क्या पर्यावरण मंजूरी की प्रक्रिया पूरी तरह से हुई है और क्या इसकी स्वतंत्र न्यायिक जांच हुई है?

परियोजना का मूल्यांकन पर्यावरण प्रभाव आकलन अधिसूचना, 2006 और तटीय विनियमन क्षेत्र अधिसूचना, 2019 के अनुरूप व्यापक रूप से किया गया है। सभी संबंधित पर्यावरणीय पहलुओं की विशेषज्ञ संस्थाओं द्वारा गहन जांच की गई। पर्यावरणीय मंजूरी में विस्तृत और लागू करने योग्य शर्तें शामिल हैं, जिन्हें एक मजबूत पर्यावरण प्रबंधन योजना और निरंतर निगरानी तंत्र का समर्थन प्राप्त है। इससे यह सुनिश्चित होता है कि सभी पहचानी गई पर्यावरणीय चिंताओं का उचित समाधान किया गया है।

इसके अलावा, यह भी प्रस्तुत किया जाता है कि इस परियोजना ने पर्यावरणीय मामलों के निपटारे के लिए स्थापित विशेष वैधानिक निकाय, राष्ट्रीय हरित अधिकरण (एनजीटी), के समक्ष न्यायिक जांच का सामना किया है। माननीय अधिकरण ने याचिकाओं, अभिलेखों और विशेषज्ञों के सुझावों पर विचार करने के बाद निर्णय प्रक्रिया को बरकरार रखा। इससे यह पुष्टि होती है कि पर्यावरणीय चिंताओं की कानून के अनुसार विधिवत जांच की गई है और समाधान किया गया है।

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पीआईबी रिसर्च

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