09/19/2026 | Press release | Distributed by Public on 09/19/2026 10:36
खबरों के खिलाड़ी: क्या दलबदल कानून को और सख्त करने का आ गया समय, विश्लेषकों ने बताया इसका क्या रास्ता
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खबरों के खिलाड़ी: क्या दलबदल कानून को और सख्त करने का आ गया समय, विश्लेषकों ने बताया इसका क्या रास्ता
न्यूज डेस्क, अमर उजाला Published by: कीर्तिवर्धन मिश्र Updated Sat, 19 Sep 2026 09:44 PM IST
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खबरों के खिलाड़ी। - फोटो : अमर उजाला
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पश्चिम बंगाल की राजनीति में तृणमूल कांग्रेस के भीतर पार्टी के नाम और चुनाव चिह्न को लेकर विवाद गहरा गया है। ममता बनर्जी के नेतृत्व वाले गुट और बागी गुट के बीच जारी खींचतान के बीच आगामी उपचुनाव के लिए अलग नाम और चुनाव चिह्न आवंटित किए गए हैं। आयोग ने स्पष्ट किया है कि यह अंतरिम व्यवस्था अंतिम निर्णय होने तक लागू रहेगी। इस घमासान के बीच एक बार फिर दल-बदल कानून चर्चा में है। इसी चर्चा के बीच पूर्व केंद्रीय मंत्री कपिल सिबल ने सुझाव दिया कि जो कोई भी अपने सक्रिय कार्यकाल के दौरान अपनी राजनीतिक पार्टी बदलता है, उसे अगले पांच या दस साल के लिए चुनाव लड़ने और निर्वाचित प्रतिनिधि के रूप में सेवा करने के लिए अयोग्य घोषित कर दिया जाना चाहिए। इस हफ्ते खबरों के खिलाड़ी में इसी पर चर्चा हुई। चर्चा के लिए वरिष्ठ पत्रकार विनोद अग्निहोत्री, पूर्णिमा त्रिपाठी, राकेश शुक्ल और अजय सेतिया मौजूद रहे।
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पूर्णिमा त्रिपाठी: जो सिर्फ सत्ता देखकर पाला बदलते हैं वो कहीं भी रहेंगे पार्टी के लिए खतरा तो रहेंगे ही। हमने मध्य प्रदेश, महाराष्ट्र जैसे राज्यों में ये देखा। आज ममता के साथ हुआ तो कल किसी और के साथ नहीं होगा ऐसा कोई नहीं कह सकता है। कल को ये भाजपा के साथ नहीं होगा इसकी भी कोई गारंटी नहीं है। मुझे लगता है कि इसे रोकने के लिए तत्काल सदस्यता जाने जैसे प्रावधान लाने होंगे।
राकेश शुक्ल: ये नैतिकता और सिद्धांत का विषय है। जिस दिन राजनीतिक दलों में नैतिकता आ जाएगी और वो के सिद्धांत को अपनाएंगी तो इस तरह के किसी कानून की जरूरत नहीं पड़ेगी। सभी राजनीतिक दलों को एक सिद्धांत तय करेगा। आज जरूरत ये नहीं है कि कानून को सख्त किया जाए, लेकिन ये राजनीतिक दलों को तय करना पड़ेगा। क्योंकि दंड ही हर चीज का समाधान नहीं होता है।
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अजय सेतिया: पार्टियां किसी की मिल्कियत जैसे हो गई हैं। अगर ये खत्म हो जाए तो किसी को दलबदल की जरूरत ही नहीं पड़ेगी। नैतिकता का जहां तक सवाल है तो अटल बिहारी वाजपेयी सरकार तक के समय तक के उदाहण आपको मिलेंगे। उसके बाद के दौर में नैतिकता का सियासत में कोई स्थान नहीं रह गया। दलबदल कानून को बदलने या उसे कठोर या ढीला करने के बजाय पार्टियों में आंतरिक लोकतंत्र पर काम किया जाए तो ज्यादा बेहतर होगा।
विनोद अग्निहोत्री: दलबदल कानून तब बना था जब राजीव गांधी प्रधानमंत्री थे। तब उनके पास 400 से ज्यादा सांसद थे। यानी, उनके दल के पास टूटने का खतरा नहीं था। अटल बिहारी वाजपेयी के समय इसमें संसोधन हुआ और एक तिहाई की जगह दो तिहाई वाला प्रावधान आया। लोकतंत्र की बात करें तो किस पार्टी में आंतरिक लोकतांत्रिक है ये देखना होगा। कुछ एक उदाहरण के आलाव आपको ढूंढे नहीं मिलेगा। मुझे लगता है कि जनता भी तो इसके लिए कुछ हद तक जिम्मेदार है। क्योंकि दलबदल करने वाले ज्यादातर चेहरे बाद में भी चुनाव जीत जाते हैं।
Amar Ujala Ltd published this content on September 19, 2026, and is solely responsible for the information contained herein. Distributed via Public Technologies (PUBT), unedited and unaltered, on September 19, 2026 at 16:36 UTC. If you believe the information included in the content is inaccurate or outdated and requires editing or removal, please contact us at [email protected]