Ministry of Heavy Industries of the Republic of India

07/16/2026 | Press release | Distributed by Public on 07/16/2026 09:32

केंद्रीय मंत्री डॉ. जितेंद्र सिंह ने भविष्य के जैव प्रौद्योगिकी कार्यबल तैयार करने के लिए भारत के पहले इंजीनियरिंग जीव विज्ञान स्नातक पाठ्यक्रम की घोषणा की

विज्ञान एवं प्रौद्योगिकी मंत्रालय

केंद्रीय मंत्री डॉ. जितेंद्र सिंह ने भविष्य के जैव प्रौद्योगिकी कार्यबल तैयार करने के लिए भारत के पहले इंजीनियरिंग जीव विज्ञान स्नातक पाठ्यक्रम की घोषणा की


डॉ.जितेंद्र सिंह ने 2035 तक एआई-आधारित जीव विज्ञान और जैव-विनिर्माण के माध्यम से भारत को वैश्विक जैव अर्थव्यवस्था में अग्रणी बनाने का रोडमैप लॉन्च किया

रोडमैप लॉन्च में अगली पीढ़ी के जैव प्रौद्योगिकी और जैव-विनिर्माण के लिए भारत की रणनीति की चर्चा की गई

सरकार प्रतिभा, नवाचार और उद्योग भागीदारी के माध्यम से संप्रभु जैव प्रौद्योगिकी पारिस्थितिकी तंत्र तैयार करने पर ध्यान केंद्रित कर रही है: डॉ. जितेंद्र सिंह

प्रविष्टि तिथि: 16 JUL 2026 6:14PM by PIB Delhi

केंद्रीय विज्ञान और प्रौद्योगिकी तथा पृथ्वी विज्ञान राज्य मंत्री (स्‍वतंत्र प्रभार) और प्रधानमंत्री कार्यालय, परमाणु ऊर्जा विभाग, अंतरिक्ष विभाग, कार्मिक, लोक शिकायत तथा पेंशन विभाग में राज्य मंत्री डॉ. जितेंद्र सिंह ने आज भारत के पहले इंजीनियरिंग जीवविज्ञान स्नातक पाठ्यक्रम शुरू करने की घोषणा की। उन्‍होंने इसे देश की दीर्घकालिक वैज्ञानिक, स्वास्थ्य देखभाल और आर्थिक आकांक्षाओं को पूरा करने में सक्षम एक स्वतंत्र और संप्रभु जैव प्रौद्योगिकी पारिस्थितिकी तंत्र तैयार करने की दिशा में महत्वपूर्ण कदम बताया।

"2035 तक भारत को अग्रणी जैव अर्थव्यवस्था शक्ति बनाने" के रोडमैप के शुभारंभ के अवसर पर मंत्री महोदय ने कहा कि भारत की जैव अर्थव्यवस्था के अगले चरण के लिए इंजीनियरिंग जीव विज्ञान एक आधारभूत विषय होगा और यह ठीक वैसे ही होगा जैसे कंप्यूटर विज्ञान ने डिजिटल क्रांति को आगे बढ़ाया था। उन्होंने बताया कि आईआईटी ने पहले ही चिकित्सा संस्थानों के साथ मिलकर इंटरडिसिप्लिनरी प्रोग्राम (कई विषयों को मिलाकर बनाए गए कोर्स) के लिए प्रस्ताव भेजना शुरू कर दिया है, जो इंजीनियरिंग, जीव विज्ञान और स्वास्थ्य सेवा के बढ़ते तालमेल को दर्शाता है। इस कार्यक्रम में औपचारिक शुरुआत से पहले रोडमैप प्रस्तुति, उद्योग का नज़रिया और वरिष्ठ नीति निर्माताओं के संबोधन शामिल थे।

डॉ. जितेंद्र सिंह ने नए पाठ्यक्रम की घोषणा करते हुए कहा, "हमें अपना स्वतंत्र, संप्रभु पारिस्थितिकी तंत्र बनाना होगा।" उन्होंने कहा कि यह पहल देश में अपनी तरह की पहली पहल होगी और इससे पेशेवरों की एक ऐसी नई पीढ़ी तैयार होगी जो इंजीनियरिंग, जीव विज्ञान, चिकित्सा और उभरती प्रौद्योगिकियों के संगम के समय काम करने में सक्षम होगी।

पिछले दशक में जैव प्रौद्योगिकी के क्षेत्र में भारत की तेजी से हो रही प्रगति के बारे में डॉ. जितेंद्र सिंह ने कहा कि देश की जैव अर्थव्यवस्था 2014 में लगभग 10 बिलियन अमरीकी डॉलर से बढ़कर आज लगभग 95 बिलियन अमरीकी डॉलर हो गई है और अनुमान है कि 2030 तक यह लगभग 300 बिलियन अमरीकी डॉलर तक पहुंच जाएगी। उन्होंने बताया कि भारत में अब 11,000 से अधिक जैव प्रौद्योगिकी स्टार्ट-अप हैं, जो देश के नवाचार पारिस्थितिकी तंत्र में आए बदलाव को दर्शाता है।

मंत्री जी ने कहा कि भारत उन कुछ देशों में से एक बन गया है, जिनकी जैव प्रौद्योगिकी नीति, अर्थव्यवस्था, रोजगार और पर्यावरण के लिए जैव प्रौद्योगिकी पर केंद्रित है। इससे वैज्ञानिक अनुसंधान को तेजी से आर्थिक और सामाजिक परिणामों में बदला जा सकता है। उन्होंने कहा कि भारत, वैश्विक विकासों का अनुसरण करने से आगे बढ़कर जैव प्रौद्योगिकी के नए और महत्‍वपूर्ण क्षेत्र में सक्रिय योगदान देने वाला देश बन रहा है।

स्वास्थ्य देखभाल जैव प्रौद्योगिकी के क्षेत्र में भारत की उपलब्धियों का जिक्र करते हुए डॉ. जितेंद्र सिंह ने कहा कि देश ने कोविड-19 से निपटने के लिए दुनिया का पहला डीएनए वैक्‍सीन विकसित किया और लगभग 30 देशों को वैक्‍सीन की आपूर्ति की, जो भारत की बढ़ती वैज्ञानिक क्षमताओं और वैश्विक नेतृत्व को दर्शाता है। उन्होंने कहा कि जहां सीएआर-टी सेल थेरेपी और नई जीन-आधारित थेरेपी में स्वदेशी प्रगति से उन्नत इलाज अधिक किफायती हो रहे हैं, वहीं लागत प्रभावी वैश्विक स्वास्थ्य सेवा गंतव्य के रूप में भारत की स्थिति मजबूत हो रही है।

मंत्री जी ने जोर दिया कि जैव प्रौद्योगिकी का भविष्य मुख्‍य रूप से सिंथेटिक जीव विज्ञान, एआई-आधारित जैविक अनुसंधान और जैव-विनिर्माण से निर्धारित होगा। उन्होंने कहा कि नई प्रोटीन डिजाइन करने, जीवित-सेल-आधारित दवाएं, स्वच्छ ईंधन और टिकाऊ खाद्य प्रणालियों को विकसित करने में सक्षम प्रौद्योगिकियों की वजह से आगामी दशकों में स्वास्थ्य सेवा, कृषि और उद्योग में बुनियादी बदलाव आएगा।

डॉ. जितेन्द्र सिंह ने उद्योग के साथ मजबूत भागीदारी की आवश्‍यकता पर ज़ोर देते हुए कहा कि भारत ने सोच-विचार करके जैव प्रौद्योगिकी के क्षेत्र में निजी क्षेत्र की भागीदारी को बढ़ाने का निर्णय लिया है। उन्होंने कहा कि स्वदेशी डीएनए वैक्सीन जैसी सफल पहलें दर्शाती हैं कि प्रौद्योगिकी विकास के शुरुआती चरणों से उद्योग का सहयोग महत्वपूर्ण होता है। उन्होंने इस क्षेत्र से जुड़े सभी लोगों से आग्रह किया कि वे पारंपरिक मानसिकता से आगे बढ़कर वैज्ञानिकों, उद्यमियों और विनिर्माताओं के बीच मजबूत साझेदारी करें, ताकि तेजी से नवाचार किए जा सकें।

मंत्री महोदय ने कहा कि स्वदेशी जैव-विनिर्माण क्षमताओं को बढ़ाना, प्रतिभा विकास को मजबूत करना और विज्ञान, स्वास्थ्य तथा उद्योग के बीच अंतर-क्षेत्रीय सहयोग को बढ़ावा देना भी महत्वपूर्ण है। उन्होंने कहा कि इंजीनियरिंग जीव विज्ञान जैसे उभरते विषयों से भविष्य के लिए कार्यबल तैयार होगा, जो स्वास्थ्य सेवा, खाद्य सुरक्षा, पर्यावरण स्थिरता और उन्नत विनिर्माण के क्षेत्र में भारत के लक्ष्यों को पूरा करने में सहायक होंगे।

जैव प्रौद्योगिकी विभाग में सचिव डॉ. राजेश एस. गोखले ने सभा में कहा कि भारत आज दुनिया की सबसे तेजी से बढ़ती जैव अर्थव्यवस्थाओं में से एक है, जिसकी वार्षिक वृद्धि 15-18 प्रतिशत है। उन्होंने कहा कि बायोई3 नीति जैसी प्रगतिशील नीतिगत पहलों की मदद से देश में लगभग 100 बायो-इन्क्यूबेटर और 10,000 से अधिक जैव प्रौद्योगिकी कंपनियां स्‍थापित की गई हैं। उन्होंने कहा कि इस रोडमैप से जहां नवाचार-आधारित जैव-विनिर्माण, सटीक स्वास्थ्य देखभाल, टिकाऊ कृषि और एआई-आधारित जीव विज्ञान को आगे बढ़ाने के लिए एक रणनीतिक ढांचा उपलब्‍ध होता है, वहीं कुशल कार्यबल और विश्व स्तर पर प्रतिस्पर्धी जैव प्रौद्योगिकी पारिस्थितिकी तंत्र भी तैयार होता है।

नीति आयोग के सदस्य प्रो. गोबर्धन दास ने कहा कि भारत जैव प्रौद्योगिकी के क्षेत्र में एक ऐसे महत्‍वपूर्ण मोड़ पर है, जिसकी तुलना पिछली औद्योगिक क्रांतियों से की जा सकती है। उन्होंने कहा कि देश की जैव अर्थव्यवस्था पिछले एक दशक में लगभग 16 गुना बढ़ी है और राष्ट्रीय सकल घरेलू उत्पाद में इसका योगदान 4.8 प्रतिशत है। लॉन्च किए गए इस रोडमैप के बारे में उन्होंने कहा कि इसका लक्ष्य 50,000 करोड़ रुपये के प्रस्तावित जैव अर्थव्यवस्था विकास कोष, बेहतर प्रतिभा पाइपलाइन और विश्व स्तरीय जैव-विनिर्माण क्षमताओं की सहायता से 2035 तक भारत की जैव अर्थव्यवस्था को लगभग 700 बिलियन अमेरिकी डॉलर तक पहुंचाना है। उन्होंने उद्योग, अनुसंधानकर्ताओं और निवेशकों से अपील की कि वे भारत को दुनिया की शीर्ष जैव प्रौद्योगिकी शक्तियों में से एक बनाने की दिशा में मिलकर काम करें।

अपने संबोधन के अंत में डॉ. जितेंद्र सिंह ने कहा कि आगामी दशक, वैश्विक जैव अर्थव्यवस्था में भारत की स्थिति निर्धारित करेगा। उन्होंने विश्वास व्‍यक्‍त किया कि अनुसंधान, प्रतिभा विकास, उद्योग भागीदारी और उभरती प्रौद्योगिकियों में निरंतर निवेश से भारत न केवल स्वास्थ्य और खाद्य सुरक्षा को मजबूत करेगा बल्कि लाखों अधिक कौशल वाले रोजगार भी सृजित करेगा और विश्व स्तर पर प्रतिस्पर्धी जैव प्रौद्योगिकी शक्ति बनेगा।

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पीके/केसी/एमके/एसएस


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