विस्तार
प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी का निमंत्रण लेकर चीन गए एनएसए अजीत डोभाल वापस लौट आए हैं। इस दौरे के दौरान दोनों देशों के सीमा विवाद सुलझाने के लिए नियुक्त विशेष प्रतिनिधियों ने सीमा विवाद को सुलझाने की दिशा में बात की। अरुणाचल प्रदेश को लेकर चीन के दावे, भारत की संवेदनशीलता पर भी बात हुई। चीन के विदेश मंत्री और एनएसए वांग यी ने भी अपने भारत के समकक्ष की बात का समर्थन किया है। कह सकते हैं कि भारत-चीन 2005 में बनी ऐतिहासिक सहमित पर अमल के लिए तैयार हैं। इस मोड़ पर आने से पहले दोनों देशों ने सीधी उड़ान सेवा को मंजूरी दे दी थी। भारत के साथ रुकी कैलाश मानसरोवर यात्रा अब शुरू हो चुकी है। दोनों देशों के बीच में तीन दर्रों से पारंपिरक व्यापार की प्रक्रिया आरंभ है।
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भारत-चीन के मामले में अमेरिका समेत दुनिया के देशों की निगाह
पूर्व विदेश सचिव शशांक का कहना है कि भारत को अमेरिका का प्रेम थोड़ा संतुलित करना चाहिए। हमने इसे थोड़ा ज्यादा कर लिया था। शशांक मानते हैं कि अमेरिकी रणनीतिकार भारत को बहुत आगे नहीं बढ़ने देना चाहते। वह अपनी जरूरत के हिसाब से 'पॉलिसी शिफ्ट' करते रहते हैं। आपरेशन सिन्दूर के बाद से उन्हें फिर पाकिस्तान अच्छा लगने लगा है। इसलिए जरूरी है कि भारत को पुराने विश्वसनीय सामरिक साझीदार और सहयोगी देश रूस के साथ रिश्ते की गंभीरता को बनाए रखना चाहिए। वैश्विक संबंधों में संतुलन को वरीयता देते हुए ब्रिक्स फोरम को मजबूती देनी चाहिए।
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माना जा रहा है कि 12-13 सितंबर को नई दिल्ली के 'भारत मंडपम'से लेकर लुटिअन जोन तक ब्रिक्स शिखर सम्मेलन में एक केमिस्ट्री देखने को मिलेगी। पूर्व विदेश सचिव शशांक मानते हैं कि रूस के राष्ट्रपित पुतिन लगातार ब्रिक्स को मजबूती देने का प्रयास कर रहे हैं। यह फोरम बिना भारत और चीन के बीच में एक सामंजस्य बने बिना मजबूत नहीं हो सकता। वैसे भी भारत वैश्विक स्तर पर बहुध्रुवीय व्यवस्था का पक्षधर है। प्रधानमंत्री मोदी ने जी-20 शिखर सम्मेलन से जिस ग्लोबल साऊथ(विकासशील देश) की आवाज उठाई है, उसका हित बहुध्रुवीय वैश्विक मंच में ही संभव है।
एक दूसरे के लिए क्यों जरूरी हैं भारत-चीन?
दोनों सबसे अधिक जनसंख्या वाले देश हैं। दोनों देशों में शांति और स्थिरता पूरे उपमहाद्वीप में युद्ध और तनाव की संभावना को बहुत कम करती है। इससे न केवल भारत और चीन के संसाधनों की बचत होती है, बल्कि कारोबार, व्यापार और क्षेत्रीय सुरक्षा, स्थिरता को बढ़ावा मिलता है। इसका असर भारत में तकनीक, निवेश लाने, जरूरी सामान की उपलब्धता पर पड़ता है। चीन से रेअरअर्थ खनिज, खाद, एक्टिव फार्मास्युटिकल इंग्रेडिएंट्स, स्मार्टफोन, रसायन, दूरसंचार के उपकरण, इलेक्ट्रानिक कंपोनेंट, सेमीकंडक्टर, मशीने, रिएक्टर, बॉयलर, पॉलीमर और पैकेजिंग सामग्री आदि आसानी से मिल जाती हैं। चीन की आपूर्ति श्रृंखला मजबूत है और इससे भारतीय ओद्योगिक उत्पादन क्षेत्र प्रभावी तरीके से काम करता है।
भारत विकासशील देशों की आवाज उठाता है। यह चीन के लिए बहुत बड़ा उपभोक्ता बाजार है। चीन की अर्थव्यवस्था को अभी भारत जैसे बाजार की आवश्यकता है। अमेरिका के साथ चीन का ट्रेड वॉर अभी खत्म नहीं हुआ है। भारत भी अमेरिका के राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप की टैक्स नीति से पीड़ित और सशंकित है। भारत चीन की मजबूत आपूर्ति श्रृंखला को बनाए रखने में बहुत सहायक रहता है। भारत की कोशिश है कि चीन सीमा विवाद पर अंतरराष्ट्रीय और द्विपक्षीय स्तर पर पूर्व में बनी सहमति (2005)और समझौते का सम्मान करे। लद्दाख सीमा पर सैन्य बलों संख्य में कटौती करके अप्रैल 2020 की स्थिति बहाल करे ताकि सीमा पर भरोसे के साथ शांति और स्थायित्व स्थापित हो सके।
2005 में भारत-चीन के बीच में हुआ था एतिहासिक समझौता
11 अप्रैल 2005 को भारत और चीन में सीमा विवाद के समाधान की दिशा में अहम सहमित बनी थी। इसमें 1.स्थानीय आबादी के हितों और स्थापित बस्तियों की सुरक्षा, 2. वास्तविक नियंत्रण रेखा(एलएसी) प्रतिबद्धता के साथ सम्मान, 3.आमने-सामने होने की दशा में पूर्ण आत्म संयम और किसी तरह के बल का प्रयोग न करना, धमकी न देना 4. सीमा विवाद को एक तरफ रखकर बिना इससे प्रभावित हुए व्यापार, कारोबार, संस्कृति समेत अन्य क्षेत्रों में द्विपक्षीय संबंधों को आगे बढ़ाना और 5. सीमा विवाद के स्थायी समाधान के लिए दोनों देश विशेष प्रतिनिधि के माध्यम से निश्चत रूप-रेखा तैयार करना, शामिल है। यह समझौता चीन के प्रधानमंत्री वेन च्या पाओ की भारत यात्रा के दौरान तत्कालीन प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह से दि्वपक्षीय वार्ता के बाद हुआ था। इस पर भारत के तत्कालीन एनएसए एम.के. नारायणन और चीन के दाई बिंगुओ के हस्ताक्षर हुए थे।
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आगे का रोडमैप क्या है?
भारत और चीन अब प्रतिद्वंदता के रास्ते से परहेज करेंगे। भारत-रूस के बीच में रिश्ते का महत्व बना रहेगा। भारत ब्रिक्स शिखर सम्मेलन-2026 का अध्यक्ष भी है। इसलिए नई दिल्ली राष्ट्रीय हित को महत्व देकर आगे बढ़ेगा। प्रधानमंत्री अगले सप्ताह एससीओ शिखर सम्मेलन में भाग लेने के लिए कजाकिस्तान के बिश्केक शहर में जाएंगे। वहां राष्ट्रपित पुतिन, राष्ट्रपति शी जिनपिंग के अलावा एससीओ के अन्य सदस्य देश भी होंगे। पाकिस्तान के हुक्मरान भी बिश्केक में होंगे। ऐसा माना जा रहा है कि बिश्केक में ब्रिक्स शिखर सम्मेलन-2026 के फ्लेवर की झलक मिल जाएगी। इसके बाद ब्रिक्स के शिखर नेता दिल्ली में होंगे और आगे का रास्ता तय होगा।