Amar Ujala Ltd

08/29/2026 | Press release | Distributed by Public on 08/28/2026 23:30

एक्सप्लेनर: 22,000 करोड़ कर्ज का मामला 6.5 करोड़ में निपटा, सुभाष चंद्रा मामले में कैसे चली देनदारी पर कैंची

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एक्सप्लेनर: 22,000 करोड़ कर्ज का मामला 6.5 करोड़ में निपटा, सुभाष चंद्रा मामले में कैसे चली देनदारी पर कैंची?

Sat, 29 Aug 2026 09:38 AM IST
द बोनस बोनस डेस्क।
बोनस डेस्क। Published by: द बोनस Updated Sat, 29 Aug 2026 09:38 AM IST
सार

कॉरपोरेट विवादों को बट्टे खाते में डालने पर क्यों उठ रहे हैं सवाल? आखिर एचडीएफसी बैंक क्यों कर रहा है विरोध? जानिए सुभाष चंद्रा से जुड़े मामले में ऐसे सवालों के जवाब

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सुभाष चंद्रा दिवालियापन मामला - फोटो : अमर उजाला ग्राफिक्स
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विस्तार

नेशनल कंपनी लॉ ट्रिब्यूनल की दिल्ली बेंच द्वारा एस्सेल समूह के संस्थापक सुभाष चंद्रा के पर्सनल इनसॉल्वेंसी मामले में दिए गए ताजा आदेश ने भारतीय बैंकिंग और कॉरपोरेट जगत के सामने कई सवाल खड़े कर दिए हैं। इसके बाद देश की नियामकीय प्रक्रियाओं को लेकर नई बहस छिड़ गई है। क्या भारत में नुकसान सहकर ऐसे मामले दबाने की परंपरा बनती जा रही है?

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नुकसान पर समझौते का पहला मामला नहीं
कॉरपोरेट देनदारियों और भारी नुकसान पर समझौते का यह कोई पहला मामला नहीं है। भारतीय बैंकिंग तंत्र में विवादों और चूक को भारी रकम चुकाकर निपटाने की एक लंबी परिपाटी रही है।
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  • नुकसान सहने का उदाहरण हाल में बैंक ऑफ बड़ौदा मामले में भी देखने को मिला था।
  • यूएई के चर्चित एनएमसी हेल्थकेयर घोटाले में 4 अरब डॉलर का कर्ज छुपाने के आरोप लगे थे। 

पूरा मामला कैसे शुरू हुआ
नेशनल कंपनी लॉ ट्रिब्यूनल ने सुभाष चंद्रा के खिलाफ कर्जदाताओं के 22,000 करोड़ रुपये से अधिक के इनसॉल्वेंसी दावे को मात्र 6.5 करोड़ रुपये में सेटल करने का आदेश दिया। यह इनसॉल्वेंसी एंड बैंकरप्सी कोड के इतिहास का सबसे बड़ा हेयरकट (करीब 99.97%) है। रीपेमेंट प्लान के पक्ष में 80 फीसदी से अधिक कर्जदाताओं ने वोट देकर इसे स्वीकार किया।

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6.5 करोड़ रुपये का टोकन क्यों...
दिवालिया कानून के तहत पर्सनल गारंटी को कॉरपोरेट डिफॉल्ट से अलग रखकर डील करने का प्रावधान है। सुभाष चंद्रा ने इस कानूनी व्यवस्था का लाभ उठाया। अपनी व्यक्तिगत संपत्ति से मात्र 6.5 करोड़ रुपये का टोकन भुगतान देकर वे हजारों करोड़ की पर्सनल गारंटी की देनदारी से कानूनी तौर पर बरी हो गए।

नुकसान किसका हुआ...
डूबी हुई रकम आम जनता और जमाकर्ताओं की बचत थी, जो बैंकों के जरिये कर्ज के रूप में दी गई थी। बैंकों को इस भारी नुकसान की भरपाई अपनी पूंजी से प्रोविजनिंग के माध्यम से करनी पड़ेगी।

बैंकिंग और दिवालिया कानून के लिए क्या खतरे
यह फैसला अन्य बड़े डिफॉल्टर प्रमोटरों के लिए एक रास्ता खोलता है, जहां कंपनी का प्रमोटर या सीईओ भारी कर्ज के बदले पर्सनल गारंटी देकर बाद में नाममात्र की रकम चुकाकर अपनी जिम्मेदारी से मुक्त हो सकता है। यह फैसला दिखाता है कि जिस पर्सनल गारंटी को बैंक सबसे बड़ा सुरक्षा कवच मानते थे, वह व्यावहारिक रूप से बेअसर साबित हो रही है। यदि सरकार कानून में संशोधन नहीं करती या उच्च अदालतें इस पर दखल नहीं देती हैं, तो यह क्रेडिट अनुशासन और बैंकिंग व्यवस्था के लिए बड़ा झटका होगा। nबोनस डेस्क

एचडीएफसी और एलआईसी क्यों कर रहे विरोध
एचडीएफसी बैंक, एलआईसी हाउसिंग फाइनेंस, केनरा बैंक, एक्सिस बैंक, यूनियन बैंक और आरबीएल बैंक इसके विरोध में हैं। तर्क है कि अगर हजारों करोड़ के बकाये पर पर्सनल गारंटर से महज चंद करोड़ ही वसूले जाएंगे, तो भविष्य में पर्सनल गारंटी लेने का कोई व्यावहारिक या कानूनी मतलब नहीं रह जाएगा।
Amar Ujala Ltd published this content on August 29, 2026, and is solely responsible for the information contained herein. Distributed via Public Technologies (PUBT), unedited and unaltered, on August 29, 2026 at 05:30 UTC. If you believe the information included in the content is inaccurate or outdated and requires editing or removal, please contact us at [email protected]