10/30/2026 | Press release | Distributed by Public on 10/29/2026 18:35
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इस्राइल में चुनाव के बाद रोचक समीकरण सामने आ रहे हैं। स्थानीय मीडिया की खबरों के मुताबिक मौजूदा प्रधानमंत्री बेंजामिन नेतन्याहू के नेतृत्व वाले दल- 'लिकुड' को सर्वाधिक वोट मिले हैं। हालांकि, सबसे बड़ी पार्टी बनने के बावजूद लिकुड स्पष्ट बहुमत के आंकड़े से दूर है। इस चुनाव में किसी को भी स्पष्ट बहुमत नहीं मिला है। अरब देशों के समर्थन वाले खेमे को किंगमेकर की तरह देखा जा रहा है।
पश्चिम एशिया में ईरान और अन्य देशों के साथ टकराव के अलावा गाजा पट्टी में अक्तूबर 2023 से ही जारी संघर्ष के बीच इस्राइल में उभरे नए राजनीतिक समीकरण में कौन किसका समर्थन करेगा? नेतन्याहू क्या प्रधानमंत्री पद पर बरकरार रहने में सफल रहेंगे? इस्राइल की संसद में कैसे दांव-पेंच देखने को मिल सकते हैं? इस्राइल की स्थानीय मीडिया में आई सूचनाओं के आधार पर भावी सरकार को लेकर कैसे अनुमान सामने आए हैं? पढ़ें ऐसे सवालों के जवाब तलाशती ये रिपोर्ट
दरअसल, इस्राइल में साल 2026 के संसदीय चुनाव में दो दशक से अधिक समय से सत्तारूढ़ नेतन्याहू के सामने पूर्व सैन्य अधिकारी बड़े चैलेंजर बनकर उभरे। मतों की अंतिम गिनती के बाद इस बात की पुष्टि हुई कि प्रधानमंत्री बेंजामिन नेतन्याहू के दक्षिणपंथी गुट को 53 सीटें मिली हैं। ये संख्या सरकार बनाने के लिए आवश्यक 61 सीटों के बहुमत से यह कम है। इस्राइल अखबार द यरुशलम पोस्ट के मुताबिक केंद्रीय चुनाव समिति की तरफ से गुरुवार देर रात (भारतीय समय) आधिकारिक आंकड़े जारी किए गए। इसके अनुसार, विपक्षी गुट को 48 सीटें मिलीं हैं। अब चूंकि दोनों गुट 61 सीटों का पूर्ण बहुमत हासिल नहीं कर पाए हैं ऐसे में 19 सीटें जीतने वाली अरब पार्टियां किंगमेकर बनकर उभरी हैं।
मौजूदा प्रधानमंत्री नेतन्याहू की लिकुड पार्टी को 27 सीटें मिलने की उम्मीद है। इस तरह यह इस्राइली संसद (नेसेट) में सबसे बड़ी पार्टी बन जाएगी। हालांकि, संसद में शक्ति परीक्षण के दौरान अगर नेतन्याहू विश्वास मत हासिल करने में विफल रहने के कारण पद गंवा देते हैं, तो उन्हें कई मुश्किलों का सामना करना पड़ सकता है। उन्हें लंबे समय से चले आ रहे भ्रष्टाचार के आरोपों के लिए जवाबदेही का सामना करना होगा। इसके अलावा, 7 अक्तूबर, 2023 को हुए हमास के नेतृत्व वाले हमले से जुड़ी सुरक्षा चूक की औपचारिक जांच भी शुरू होने की संभावना है। ऐसे में सबकी नजरें इस सवाल पर भी टिकी हैं कि क्या आने वाले कुछ दिनों में इस्राइल से नए प्रधानमंत्री के शपथ ग्रहण की खबर आएगी, या नेतन्याहू अपनी कुर्सी बचाने में सफल रहेंगे।
रिपोर्ट्स के मुताबिक गठबंधन में भूमिका के बिना भी, अरब-नेतृत्व वाली पार्टियां अपनी बढ़ती शक्ति का प्रदर्शन कर सकती हैं। वे अगले संसद में नेतन्याहू के अन्य विरोधियों का समर्थन कर सकती हैं। इसमें एक नया अध्यक्ष चुनना शामिल हो सकता है। इसमें सफलता मिलने पर उन्हें संसद की कार्यसूची पर नियंत्रण मिलेगा। ऐसा होने पर विरोधी खेमे को नई सरकार बनने से पहले कानून बनाए जाने की विधायी प्रक्रिया को आगे बढ़ाने और विधेयकों को पारित कराने में आसानी होगी।
नेतन्याहू के मुख्य प्रतिद्वंद्वी और पूर्व सैन्य प्रमुख गादी आइजेनकोट ने संकेत दिया है कि वह शर्तों के साथ अरब-नेतृत्व वाली पार्टियों के साथ जुड़ने के लिए तैयार हैं। अरब-नेतृत्व वाली जॉइंट लिस्ट में दूसरे स्थान पर रहे अहमद तिबी ने कहा कि विपक्षी गुट ने नेसेट अध्यक्ष को बदलने पर चर्चा के लिए उनसे संपर्क किया था। तिबी ने बताया कि उनकी पार्टी गुट के उम्मीदवार का समर्थन करेगी। हालांकि, मौजूदा समीकरण को देखते हुए अगर त्रिशंकु संसद के कारण अगर नई सरकार नहीं बनती है, तो इस्राइल में अगले साल की शुरुआत में एक और बार चुनाव कराना पड़ेगा।
चुनाव प्रक्रिया जारी रहने के बीच नेतन्याहू की पार्टी ने बृहस्पतिवार को कई आरोप भी लगाए। उन्होंने कहा कि अरब-नेतृत्व वाली पार्टियों ने चुनाव "चुराया" है। इसमें संभावित रूप से विदेशी सहायता भी शामिल थी। विपक्षी दलों ने नेतन्याहू पर अरब आबादी को बदनाम करने का आरोप लगाया। यह आरोप अरब-नेतृत्व वाली पार्टियों के ऐतिहासिक प्रदर्शन के बाद लगाया गया।
चुनाव में धांधली को लेकर कतर पर नेतन्याहू के आरोप और विपक्षी खेमे के पलटवार के बीच इस्राइल के राष्ट्रपति आइजैक हर्जोग ने कहा कि देश में फिलहाल संवेदनशील समय है। उन्होंने कहा, 'हमें उस पूरे समुदाय को बदनाम नहीं करना चाहिए जिसने वोट देने के अपने अधिकार का इस्तेमाल करने और डेमोक्रेसी में एक्टिव हिस्सा लेने की कोशिश की।'
बहरहाल, अगर तमाम कोशिशों के बावजूद नई सरकार नहीं बन पाती है इस्राइल में अगले साल दोबारा चुनाव कराने पड़ेंगे। हालांकि, राष्ट्रपति हर्जग और नेतन्याहू के प्रमुख प्रतिद्वंद्वी ने कहा है कि वे दोबारा चुनाव कराने से बचना चाहते हैं। यह भी रोचक होगा कि अगर नए सिरे से चुनाव कराए जाएंगे तो क्या अरब नागरिक फिर से बड़ी संख्या में वोट डालने जाएंगे? क्या 50 साल बाद टूटा मतदान का फिर से नया कीर्तिमान बनेगा? कई लोगों ने कहा था कि उन्होंने देश को नेतन्याहू से बचाने के लिए चुनाव में बड़ी संख्या में हिस्सा लिया। ऐसे में नजरें इस बात पर भी होंगी कि क्या हजारों इस्राइली जो वोट देने के लिए घर वापस आए थे, वे फिर से वोट डालेंगे? इन सवालों के जवाब चार नवंबर से पहले मिलने के आसार हैं क्योंकि इस्राइल के कानून के मुताबिक चुनाव के नतीजे 4 नवंबर तक सर्टिफाई हो जाने चाहिए।