10/15/2026 | Press release | Distributed by Public on 10/15/2026 14:52
शारदीय नवरात्रि के छह दिन बीतते ही मां दुर्गा के छठे स्वरूप मां कात्यायनी की आराधना की जाती है। देवी का यह स्वरूप शक्ति, साहस और अन्याय पर विजय का प्रतीक माना जाता है। धार्मिक मान्यताओं के अनुसार, मां कात्यायनी की विधि-विधान से पूजा करने पर भक्तों को भय और बाधाओं से मुक्ति मिलती है। विवाह में आ रही अड़चनों को दूर करने के लिए भी देवी की उपासना का विशेष महत्व बताया गया है। इस दिन भक्त मां को प्रिय पुष्प और भोग अर्पित करके सुख-समृद्धि की कामना करते हैं। आइए जानते हैं नवरात्रि के छठे दिन मां कात्यायनी की पूजा विधि, शुभ रंग, प्रिय भोग, मंत्र, पौराणिक कथा और आरती।
मां कात्यायनी का स्वरूप कैसा है?
मां कात्यायनी सिंह पर सवार रहती हैं और उनकी चार भुजाएं हैं। उनके दो हाथों में कमल और तलवार सुशोभित हैं, जबकि अन्य दो हाथ वर मुद्रा और अभय मुद्रा में रहते हैं। देवी का यह स्वरूप भक्तों को साहस, निर्भयता और धर्म के मार्ग पर चलने की प्रेरणा देता है।
मां कात्यायनी की पूजा विधि - फोटो : Amar Ujala
मां कात्यायनी की पूजा विधि
मां कात्यायनी का प्रिय भोग - फोटो : adobe stock
मां कात्यायनी का प्रिय भोग
धार्मिक मान्यताओं के अनुसार, मां कात्यायनी को शहद प्रिय है। इसलिए नवरात्रि के छठे दिन देवी को शहद का भोग लगाया जाता है। इसके अतिरिक्त हलवा, मिठाई, गुड़ और मीठा पान भी अर्पित किया जा सकता है। भोग लगाते समय श्रद्धा और पवित्रता का ध्यान रखना चाहिए।
मां कात्यायनी का प्रिय भोग - फोटो : अमर उजाला
मां कात्यायनी की पौराणिक कथा
पौराणिक मान्यता के अनुसार, महर्षि कात्यायन ने देवी भगवती को प्रसन्न करने के लिए कठोर तपस्या की थी। उनकी भक्ति से प्रसन्न होकर देवी ने उन्हें वरदान दिया कि वह उनके घर पुत्री के रूप में जन्म लेंगी। इसी कारण देवी का नाम कात्यायनी पड़ा।
दूसरी ओर, महिषासुर नामक असुर के अत्याचारों से देवता और अन्य लोकों के प्राणी परेशान थे। उसका सामना करने के लिए ब्रह्मा, विष्णु और महेश सहित देवताओं के तेज से एक दिव्य शक्ति प्रकट हुई। इस देवी ने महर्षि कात्यायन के यहां पुत्री के रूप में जन्म लिया और आगे चलकर महिषासुर के विरुद्ध युद्ध किया।
कथा के अनुसार, महर्षि कात्यायन ने देवी की सप्तमी, अष्टमी और नवमी तिथियों पर विशेष पूजा की। इसके बाद दशमी तिथि पर देवी ने महिषासुर का वध कर दिया। इस विजय के कारण मां दुर्गा को महिषासुर मर्दिनी के नाम से भी जाना जाता है। यह कथा अधर्म पर धर्म और बुराई पर अच्छाई की विजय का संदेश देती है।
मां कात्यायनी जी की आरती - फोटो : amar ujala
मां कात्यायनी जी की आरती
जय जय अंबे जय कात्यायनी।
जय जग माता जग की महारानी ॥
बैजनाथ स्थान तुम्हारा।
वहावर दाती नाम पुकारा ॥
कई नाम है कई धाम है।
यह स्थान भी तो सुखधाम है॥
हर मंदिर में ज्योत तुम्हारी।
कही योगेश्वरी महिमा न्यारी ॥
हर जगह उत्सव होते रहते।
हर मंदिर में भगत है कहते ॥
कत्यानी रक्षक काया की।
ग्रंथि काटे मोह माया की ॥
झूठे मोह से छुडाने वाली।
अपना नाम जपाने वाली ॥
बृहस्पतिवार को पूजा करिए।
ध्यान कात्यानी का धरिये ॥
हर संकट को दूर करेगी।
भंडारे भरपूर करेगी ॥
जो भी मां को भक्त पुकारे।
कात्यायनी सब कष्ट निवारे ॥