09/13/2026 | Press release | Distributed by Public on 09/12/2026 21:10
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सोशल मीडिया पर इन दिनों अपनी तस्वीरों को एआई की मदद से अलग-अलग अंदाज में बदलने का चलन तेजी से बढ़ रहा है। कभी लोग अपनी फोटो को 80 के दशक के रेट्रो लुक में बदल रहे हैं, तो कभी त्योहारों या खास मौकों के हिसाब से तस्वीर का रूप बदल रहे हैं। इसके लिए बस फोटो एआई टूल पर अपलोड करनी होती है और फिर निर्देश देकर तस्वीर में बदलाव कराया जा सकता है। लेकिन क्या आपने कभी सोचा है कि एआई को अपनी तस्वीर देने के बाद उसके साथ क्या-क्या हो सकता है?
फोटो में सबसे महत्वपूर्ण जानकारी आपका चेहरा होता है। चेहरा किसी व्यक्ति की पहचान से जुड़ी जानकारी है और कई मामलों में इसे बायोमेट्रिक जानकारी के तौर पर भी देखा जा सकता है।
इसलिए जब आप अपनी साफ और सामने से ली गई तस्वीर किसी एआई को देते हैं, तो आप केवल एक तस्वीर नहीं दे रहे होते, बल्कि उसमें मौजूद पहचान संबंधी जानकारी भी साझा कर रहे होते हैं। ऐसी जानकारी के लीक होने, बिना अनुमति इस्तेमाल होने या किसी व्यक्ति की पहचान से दोबारा जुड़ जाने का जोखिम रहता है।
कई बार हम फोटो के पीछे दिखाई देने वाली चीजों पर ध्यान नहीं देते। लेकिन घर का नंबर, सड़क का नाम, कार्यालय का बोर्ड, स्कूल, दुकान या कोई पहचान योग्य जगह आपकी पहचान या स्थान का पता लगाने में मदद कर सकती है।
एनआईएसटी के अनुसार, एआई अलग-अलग स्रोतों से मिली जानकारियों को जोड़कर ऐसी व्यक्तिगत या संवेदनशील जानकारी का अनुमान लगा सकता है, जिसे उपयोगकर्ता ने सीधे साझा नहीं किया हो।
तस्वीर में दिखाई देने वाली चीजों के अलावा उसमें डिजिटल मेटाडेटा भी हो सकता है। ईएक्सआईएफ मेटाडेटा में कैमरे का मॉडल, तस्वीर बनने की तारीख और स्थान जैसी जानकारी शामिल हो सकती है। हालांकि हर फोटो या हर प्लेटफॉर्म पर यह जानकारी मौजूद रहे, यह जरूरी नहीं है।
इसलिए फोटो साझा करने से पहले केवल यह देखना पर्याप्त नहीं कि तस्वीर में क्या दिखाई दे रहा है, बल्कि यह भी देखना जरूरी है कि तस्वीर के साथ कौन-सी डिजिटल जानकारी जुड़ी हो सकती है।
अगर फोटो में आधार कार्ड, पासपोर्ट, पैन कार्ड, मेडिकल रिपोर्ट, पहचान पत्र या कोई दूसरा दस्तावेज दिखाई दे रहा है तो उसमें चेहरे के अलावा बहुत ज्यादा निजी जानकारी मौजूद हो सकती है।
ऐसी तस्वीर को किसी एआई टूल पर अपलोड करने से उस जानकारी के साथ भी निजता का जोखिम जुड़ जाता है। इसलिए किसी दस्तावेज की फोटो को सिर्फ इसलिए एआई पर नहीं डालना चाहिए कि एआई उसमें से कुछ पढ़ या समझ सके।
हर एआई टूल आपकी अपलोड की गई फोटो को मॉडल के प्रशिक्षण के लिए इस्तेमाल करती है, ऐसा नहीं है। अलग-अलग कंपनियों की डेटा नीतियां अलग हो सकती हैं। कुछ कंपनियां अपलोड की गई सामग्री को मॉडल सुधारने के लिए इस्तेमाल कर सकती हैं, जबकि कुछ अलग शर्तें रख सकती हैं।
एआई मॉडल के विकास में बड़ी मात्रा में डेटा का इस्तेमाल होता है और उसमें व्यक्तिगत जानकारी भी शामिल हो सकती है। कई बार यह स्पष्ट नहीं होता कि किसी मॉडल के प्रशिक्षण में कौन-कौन से विशेष डेटा स्रोत इस्तेमाल किए गए हैं। इसलिए फोटो अपलोड करने से पहले उस सेवा की डेटा उपयोग नीति और निजता नीति पढ़ना जरूरी है।
किसी एआई टूल पर फोटो डालने से पहले यह जानना जरूरी है कि वह फोटो कितने समय तक उस टूल के पास रह सकती है और उसका इस्तेमाल किन कामों के लिए किया जा सकता है। देखें कि:
एआई का खतरा केवल उस जानकारी तक सीमित नहीं है जो आपने उसे सीधे दी है। अलग-अलग सूचनाओं को जोड़कर एआई व्यक्तिगत या संवेदनशील जानकारी का अनुमान लगा सकता है।
एनआईएसटी के मुताबिक ऐसा अनुमान सही भी हो सकता है और गलत भी। लेकिन गलत अनुमान भी नुकसान पहुंचा सकता है, खासकर तब जब उसके आधार पर किसी व्यक्ति के बारे में धारणा बनाई जाए या उसके साथ कोई प्रतिकूल फैसला लिया जाए।
एनआईएसटी के मुताबिक जनरेटिव एआई बहुत वास्तविक दिखने वाली तस्वीरें और डीपफेक बना सकता है। इनका इस्तेमाल गलत सूचना फैलाने या किसी व्यक्ति की पहचान की नकल करने के लिए किया जा सकता है। यानी किसी व्यक्ति की असली तस्वीर में ऐसी चीजें जोड़ी जा सकती हैं जो मूल तस्वीर में थीं ही नहीं।
किसी सामान्य फोटो में कोई आपत्तिजनक चीज नहीं होती, लेकिन एआई उसका इस्तेमाल करके नई हानिकारक तस्वीर बना सकता है। एनआईएसटी ने वास्तविक लोगों से जुड़ी गैर-सहमति वाली अंतरंग तस्वीरों और ऐसी हानिकारक सामग्री को गंभीर जोखिम माना है। इस तरह की तस्वीरों से निजता के साथ-साथ मानसिक और भावनात्मक नुकसान भी हो सकता है।
एआई किसी व्यक्ति के चेहरे, पहचान या आवाज की समानता का इस्तेमाल करके नकली सामग्री तैयार कर सकता है। एनआईएसटी ने किसी व्यक्ति की पहचान, समानता या आवाज का बिना अनुमति इस्तेमाल किए जाने से जुड़े कानूनी और निजता संबंधी सवालों को भी चिंता का विषय माना है। ऐसी सामग्री का इस्तेमाल बदनामी, धोखाधड़ी या किसी दूसरे व्यक्ति के रूप में पेश होने के लिए किया जा सकता है।
एआई से बनी तस्वीरें इतनी वास्तविक हो सकती हैं कि उन्हें देखकर तुरंत पता न चले कि वे नकली हैं। इससे उस व्यक्ति के लिए यह साबित करना मुश्किल हो सकता है कि उसके बारे में दिखाई जा रही तस्वीर असली नहीं है।
इसी वजह से तस्वीर की उत्पत्ति और उसमें हुए बदलावों का रिकॉर्ड रखने वाली तकनीकों पर जोर दिया जाता है। डिजिटल वॉटरमार्क और दूसरी तकनीकें मदद कर सकती हैं, लेकिन इनसे भी गलत पहचान या पहचान न कर पाने जैसी समस्याएं हो सकती हैं।
किसी व्यक्ति की आपत्तिजनक नकली तस्वीर वायरल होने पर उसकी प्रतिष्ठा, नौकरी, सामाजिक संबंध और मानसिक स्थिति प्रभावित हो सकती है। गैर-सहमति वाली अंतरंग एआई तस्वीरों से जुड़े संभावित नुकसान में मानसिक और भावनात्मक परेशानी के साथ आर्थिक नुकसान और जबरन वसूली जैसे खतरे भी शामिल हैं।
बच्चों की तस्वीरों को लेकर जोखिम और ज्यादा गंभीर हो जाता है। एनआईएसटी ने बच्चों से जुड़ी यौन शोषण सामग्री और वास्तविक लोगों की गैर-सहमति वाली अंतरंग तस्वीरों को जनरेटिव एआई से जुड़े गंभीर जोखिमों में शामिल किया है। 23 फरवरी 2026 के वैश्विक निजता नियामकों के संयुक्त बयान में भी बच्चों और दूसरे संवेदनशील समूहों के लिए अतिरिक्त सुरक्षा उपायों की जरूरत बताई गई है।
कनाडा के निजता आयुक्त की 11 जून 2026 की जांच में पाया गया कि दिसंबर 2025 और जनवरी 2026 में ग्रोक का इस्तेमाल वास्तविक लोगों की तस्वीरों को यौन रूप से आपत्तिजनक डीपफेक में बदलने के लिए किया गया। इनमें महिलाओं और बच्चों की तस्वीरें भी शामिल थीं।
जांच में पाया गया कि एक्स कॉर्प और एक्सएआई के पास ऐसी तस्वीरें बनाने के लिए वैध सहमति लेने की पर्याप्त व्यवस्था नहीं थी और शुरुआती सुरक्षा उपाय भी पर्याप्त नहीं थे।
6 मार्च 2026 तक कनाडा में शिकायतों के आधार पर एक्स ने 126 पोस्ट हटाई थीं, जिन्हें बच्चों से जुड़ी यौन शोषण सामग्री या बिना सहमति की अंतरंग तस्वीरों के रूप में पहचाना गया था।
कनाडा के निजता आयुक्त ने कहा कि ऐसी एआई से बनी नकली तस्वीर भी किसी पहचान योग्य व्यक्ति की निजी जानकारी हो सकती है और इससे बदनामी, मानसिक नुकसान, आर्थिक नुकसान, नौकरी के अवसरों पर असर और जबरन वसूली जैसे खतरे पैदा हो सकते हैं।
कई एआई टूल तस्वीर और उपयोगकर्ता के निर्देश की जांच करने के लिए सुरक्षा फिल्टर लगाती हैं। लेकिन एनआईएसटी के अनुसार ये फिल्टर हमेशा पूरी तरह सही नहीं होते।
कभी सामान्य सामग्री को गलत तरीके से रोक दिया जाता है और कभी हानिकारक सामग्री पहचान में नहीं आती। नए तरह के गलत इस्तेमाल सामने आने पर फिल्टर को लगातार अपडेट करना पड़ता है। यानी सुरक्षा फिल्टर मौजूद होना और पूरी सुरक्षा सुनिश्चित होना एक ही बात नहीं है।
अगर किसी व्यक्ति ने अपनी तस्वीर से एआई के जरिए नई तस्वीर बनाने की अनुमति दी है, तो इसका यह मतलब जरूरी नहीं कि नई तस्वीर को सामाजिक माध्यमों या इंटरनेट पर सार्वजनिक करने की भी अनुमति मिल गई। तस्वीर के इस्तेमाल की सहमति और उससे बनी सामग्री को सार्वजनिक करने की सहमति अलग-अलग हो सकती है।
साइबर अपराधी सार्वजनिक या एआई एप पर अपलोड की गई तस्वीर से फर्जी सोशल मीडिया अकाउंट बना सकते हैं। इसके बाद परिचितों को संदेश भेजकर बीमारी या आपात स्थिति का हवाला देकर पैसे मांगे जा सकते हैं। फर्जी अकाउंट से आपत्तिजनक सामग्री साझा कर पीड़ित की सामाजिक छवि खराब करने की कोशिश भी की जा सकती है। ऐसे फर्जी वीडियो का इस्तेमाल बदनाम करने, डराने, ठगी करने या ब्लैकमेलिंग के लिए होता है।
अगर किसी तस्वीर का दुरुपयोग कर ठगी, ब्लैकमेलिंग या फर्जी प्रोफाइल बनाने की घटना सामने आती है तो चैट, स्क्रीनशॉट, प्रोफाइल लिंक, मोबाइल नंबर, बैंक लेनदेन और संबंधित फोटो-वीडियो जैसे डिजिटल साक्ष्य सुरक्षित रखें। इन्हें डिलीट करने के बजाय पुलिस को उपलब्ध कराएं। आर्थिक साइबर ठगी की स्थिति में राष्ट्रीय साइबर हेल्पलाइन 1930 पर तुरंत शिकायत करना महत्वपूर्ण है।