08/18/2026 | Press release | Distributed by Public on 08/17/2026 18:54
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लॉगिन करेंकुछ साल पहले तक ड्रोन का नाम आते ही कैमरे से तस्वीरें लेने वाली उड़ती मशीन का ख्याल आता था। अब ड्रोन का इस्तेमाल इससे कहीं आगे निकल चुका है। खेती में कीटनाशक का छिड़काव, गांवों में जमीन की मैपिंग, हाईवे और रेलवे की निगरानी, आपदा के समय राहत-बचाव और रक्षा क्षेत्र में निगरानी जैसे कई कामों में ड्रोन का इस्तेमाल बढ़ रहा है। ऐसे में आइए जानते हैं कि ड्रोन का बाजार देश में कितना बड़ा है? ड्रोन की मांग क्यों बढ़ रही है? इसका इस्तेमाल किन-किन क्षेत्रों में हो रहा है? सरकार ने ड्रोन उद्योग के लिए क्या बदला? सरकार स्वदेशी उत्पादन पर कैसे दे रही जोर? इससे रोजगार के कितने मौके बन रहे हैं?
इंडिया ब्रांड इक्विटी फाउंडेशन (IBEF) के मुताबिक, 2025 में भारत का ड्रोन बाजार करीब 1.22 अरब डॉलर यानी लगभग 10,977 करोड़ रुपये का था। अनुमान है कि 2030 तक यह बढ़कर करीब 3.23 अरब डॉलर यानी लगभग 29,080 करोड़ रुपये हो सकता है। इस दौरान बाजार के करीब 21.51 प्रतिशत सालाना औसत दर से बढ़ने का अनुमान है।
इस बढ़ते बाजार की वजह सिर्फ ड्रोन की बिक्री नहीं है। इसके साथ ड्रोन बनाने, उनके पुर्जे तैयार करने, सॉफ्टवेयर बनाने, ड्रोन चलाने की ट्रेनिंग और ड्रोन से अलग-अलग सेवाएं देने का कारोबार भी बढ़ रहा है।
ड्रोन का सबसे बड़ा फायदा यह है कि यह कम समय में बड़े इलाके की निगरानी और सर्वे कर सकता है। जहां इंसान को पहुंचने में ज्यादा समय या मेहनत लग सकती है, वहां ड्रोन ऊपर से तस्वीर और वीडियो लेकर स्थिति की जानकारी दे सकता है। इसी वजह से सरकार और निजी क्षेत्र दोनों में इसका इस्तेमाल बढ़ रहा है। खेती, सड़क, रेलवे, जमीन के रिकॉर्ड, आपदा प्रबंधन और सुरक्षा इसके प्रमुख क्षेत्र हैं।
देश में ड्रोन के बढ़ते इस्तेमाल का एक बड़ा उदाहरण नमो ड्रोन दीदी योजना है। नवंबर 2023 में शुरू हुई इस योजना का उद्देश्य महिला स्वयं सहायता समूहों को ड्रोन उपलब्ध कराना है, ताकि वे किसानों के खेतों में कीटनाशक और दूसरे कृषि इनपुट का छिड़काव कर सकें। इससे किसानों को बड़े क्षेत्र में कम समय में छिड़काव जैसी सेवाएं मिल सकती हैं। साथ ही महिलाओं के स्वयं सहायता समूहों के लिए आय का नया जरिया बन रहा है।
सरकार के मुताबिक, लीड फर्टिलाइजर कंपनियों के जरिए महिला स्वयं सहायता समूहों को 1,094 ड्रोन दिए जा चुके हैं, जिनमें 500 से ज्यादा ड्रोन नमो ड्रोन दीदी योजना के तहत दिए गए हैं।
ड्रोन का एक महत्वपूर्ण इस्तेमाल स्वामित्व योजना में हो रहा है। इस योजना के तहत गांवों की आबादी वाली जमीन का ड्रोन से सर्वे किया जाता है। इसका मकसद जमीन का सही नक्शा तैयार करना, संपत्ति का रिकॉर्ड बेहतर करना और जमीन से जुड़े विवादों को कम करना है। संपत्ति कार्ड मिलने से लोगों को अपनी जमीन के आधार पर बैंक से कर्ज लेने में भी मदद मिल सकती है।
सरकारी आंकड़ों के अनुसार, दिसंबर 2025 तक करीब 3.28 लाख गांवों का ड्रोन सर्वे पूरा हो चुका था। यह करीब 3.44 लाख गांवों के लक्ष्य का 95 प्रतिशत है। इस दौरान 1.82 लाख गांवों के लिए 2.76 करोड़ संपत्ति कार्ड तैयार किए जा चुके थे।
देश में बड़ी संख्या में सड़क और हाईवे परियोजनाएं चल रही हैं। इनके निर्माण की निगरानी के लिए भी ड्रोन का इस्तेमाल किया जा रहा है। भारतीय राष्ट्रीय राजमार्ग प्राधिकरण यानी एनएचएआई ने हाईवे परियोजनाओं में हर महीने ड्रोन से वीडियो रिकॉर्डिंग की व्यवस्था की है। मौजूदा महीने की रिकॉर्डिंग को पिछले महीने की रिकॉर्डिंग से मिलाकर देखा जाता है, जिससे निर्माण की प्रगति का पता चलता है।
रेलवे में भी ड्रोन का इस्तेमाल ट्रैक, पुलों और दूसरी संरचनाओं की निगरानी के लिए किया जा रहा है। खासकर ऐसी जगहों पर ड्रोन उपयोगी हैं जहां इंसानों के लिए पहुंचना मुश्किल होता है। रेलवे सुरक्षा बल यानी आरपीएफ भी रेलवे यार्ड, स्टेशनों और ट्रैक के आसपास निगरानी के लिए ड्रोन का इस्तेमाल कर रहा है। इससे भीड़ और सुरक्षा से जुड़ी गतिविधियों पर नजर रखने में मदद मिलती है।
बाढ़, भूस्खलन जैसी आपदाओं में प्रभावित क्षेत्रों तक पहुंचना मुश्किल हो सकता है। ऐसे समय में ड्रोन ऊपर से पूरे इलाके की तस्वीर और वीडियो भेजकर राहत-बचाव दल को स्थिति समझने में मदद कर सकते हैं। इससे यह पता लगाने में मदद मिलती है कि कहां ज्यादा नुकसान हुआ है, लोग कहां फंसे हैं और राहत दल को किस रास्ते से पहुंचना चाहिए।
सरकार के अनुसार, उत्तर पूर्व प्रौद्योगिकी अनुप्रयोग एवं पहुंच केंद्र यानी नेक्टर ने आपदा प्रबंधन के लिए ऐसी ड्रोन प्रणाली विकसित की है, जो लंबे समय तक हवा में रह सकती है और भारी उपकरण ले जा सकती है।
ड्रोन का इस्तेमाल रक्षा क्षेत्र में भी तेजी से बढ़ा है। सीमा की निगरानी, खुफिया जानकारी जुटाने और लक्ष्यों की पहचान जैसे कामों में ड्रोन उपयोगी हैं। सरकार ने बताया कि ऑपरेशन सिंदूर के दौरान भारतीय ड्रोन और लक्ष्य तक जाकर हमला करने वाले हथियारों का इस्तेमाल किया गया। इन्हें रडार, वायु रक्षा प्रणाली और कमांड सेंटर के साथ जोड़कर भी इस्तेमाल किया जा सकता है।
2021 में ड्रोन नियम लागू होने के बाद नियमों और मंजूरी की प्रक्रिया को काफी आसान किया गया। इस बदलाव के तहत 90 प्रतिशत से ज्यादा अनुपालन प्रक्रियाएं हटा दी गईं और भरोसे पर आधारित नई व्यवस्था शुरू की गई। इसके तहत:
सरकार ने देश में ड्रोन का निर्माण बढ़ाने के लिए उत्पादन आधारित प्रोत्साहन यानी पीएलआई योजना शुरू की। इसके तहत कंपनियों को उनके द्वारा किए गए मूल्यवर्धन पर 20 प्रतिशत तक प्रोत्साहन दिया गया। इससे योजना में शामिल कंपनियों के राजस्व में करीब सात गुना बढ़ोतरी हुई। इससे देश में ड्रोन और उनके पुर्जों का उत्पादन बढ़ाने व स्थानीय स्तर पर निर्माण को प्रोत्साहन मिला। सितंबर 2025 में ड्रोन पर जीएसटी घटाकर 5 प्रतिशत कर दिया गया। इससे पहले 18 और 28 प्रतिशत की अलग-अलग जीएसटी दरें थीं।
आगे सरकार का जोर सिर्फ ड्रोन का इस्तेमाल बढ़ाने पर नहीं, बल्कि देश में ड्रोन से जुड़े पूरे उद्योग को मजबूत करने पर है। आईबीईएफ के आंकड़ों के मुताबिक, करीब 240 मिलियन डॉलर यानी 2,219 करोड़ रुपये के ड्रोन प्रौद्योगिकी प्रोत्साहन कार्यक्रम का प्रस्ताव है। इसका लक्ष्य वित्त वर्ष 2027-28 तक ड्रोन क्षेत्र में 40 प्रतिशत स्थानीयकरण हासिल करना है। इस योजना में खासतौर पर ड्रोन के पुर्जे, सॉफ्टवेयर और सेवाओं पर ध्यान दिया जाएगा। इसके अलावा अगले तीन वर्षों में 2,000 करोड़ रुपये के अतिरिक्त निवेश का प्रस्ताव है।
9 फरवरी 2026 तक भारत में 38,575 ड्रोन पंजीकृत थे और उन्हें विशिष्ट पहचान संख्या दी गई थी।
वहीं 39,890 रिमोट पायलट प्रमाणपत्र जारी किए जा चुके थे। देश में 244 प्रशिक्षण संस्थानों को डीजीसीए की मंजूरी मिली थी।
ड्रोन उद्योग में रोजगार सिर्फ पायलट बनने तक सीमित नहीं है। इसके साथ ड्रोन बनाने, सॉफ्टवेयर विकसित करने, सेंसर और इलेक्ट्रॉनिक उपकरण तैयार करने, ड्रोन की मरम्मत, आंकड़ों का विश्लेषण और सर्वे जैसे काम जुड़े हैं।
सरकार का स्वायन कार्यक्रम ड्रोन और मानव रहित विमान तकनीक के क्षेत्र में कौशल विकास पर काम कर रहा है। इसके तहत 857 से ज्यादा कार्यक्रम आयोजित किए गए हैं और 26,000 से ज्यादा लोगों को फायदा हुआ है।
छात्रों और शोधकर्ताओं के लिए निडार जैसे कार्यक्रम भी हैं, जिनमें स्वचालित ड्रोन के नए इस्तेमाल पर काम करने का अवसर मिलता है। इसमें 40 लाख रुपये की पुरस्कार राशि और स्टार्टअप को आगे बढ़ाने के लिए सहायता का प्रावधान है।
आईबीईएफ के अनुमान के मुताबिक, इस क्षेत्र से 1.20 लाख से ज्यादा विनिर्माण क्षेत्र की नौकरियां और छह लाख से अधिक सेवा क्षेत्र की नौकरियां पैदा हो सकती हैं।
ड्रोन उद्योग की एक खास बात यह है कि इसके कई हिस्सों का इस्तेमाल नागरिक और रक्षा दोनों क्षेत्रों में किया जा सकता है। आईबीईएफ के अनुसार, ड्रोन के करीब 60 से 70 प्रतिशत पुर्जे नागरिक और रक्षा दोनों क्षेत्रों में साझा हो सकते हैं। इनमें ढांचा, सेंसर और जमीन पर इस्तेमाल होने वाली प्रणालियां शामिल हैं।
रॉयटर्स के अनुसार, भारत इस साल घरेलू कंपनियों से दो अरब डॉलर से ज्यादा के सैन्य ड्रोन खरीदने की तैयारी कर रहा है। यह देश का अब तक का सबसे बड़ा सैन्य ड्रोन ऑर्डर हो सकता है। इस कदम के पीछे मई 2025 में भारत-पाकिस्तान संघर्ष का भी अहम संदर्भ है, जब दोनों देशों ने बड़े पैमाने पर ड्रोन का इस्तेमाल किया। इस संघर्ष ने युद्ध के मैदान में कम लागत वाले ड्रोन की आक्रामक क्षमता और रणनीतिक उपयोगिता को सामने ला दिया।
ड्रोन फेडरेशन ऑफ इंडिया के अध्यक्ष सुमित शाह के मुताबिक, इन ऑर्डरों की कुल कीमत 20,000 करोड़ रुपये से ज्यादा हो सकती है और डिलीवरी 18 से 24 महीनों के भीतर होने की संभावना है।
भारत पहले ही घरेलू कंपनियों से करीब 30 अरब रुपये यानी लगभग 313 मिलियन डॉलर के सामरिक ड्रोन ऑर्डर दे चुका है। नए ऑर्डर तेज खरीद प्रक्रिया के जरिए दिए जा सकते हैं, ताकि सेना की बदलती जरूरतों को जल्द पूरा किया जा सके। देश में 600 से अधिक ड्रोन कंपनियां हैं, जिनमें 100 से ज्यादा रक्षा क्षेत्र के लिए ड्रोन विकसित कर रही हैं।